ऐसे में कहा जा रहा है कि इस दौलत के दम पर पद्मनाभास्वामी मंदिर ट्रस्ट तिरुपति बालाजी ट्रस्ट को दौलत के मामले में पीछे छोड़कर देश का सबसे धनवान ट्रस्ट का खिताब हासिल कर सकता है। )
अभी ऊपर लिखी ये पोस्ट पढ़ी रूबी सिन्हा की........तो ये ख्याल आया
आज जहाँ देखो वहाँ जिस मंदिर में देखो वहीँ हर जगह सिर्फ यही सुनने को मिलता है कि अमुक मंदिर में इतने किलो का मुकुट या इतने किलो की चेन चढ़ाई गयी .......
मंदिरों में इतना पैसा होना क्या आश्चर्य की बात नहीं है ? सभी जानते हैं कि मंदिरों में श्रद्धालु अपनी कामना पूरी होने पर कुछ ना कुछ चढाते ही हैं लेकिन मेरा कहना है कि यदि इतना पैसा मंदिरों में है तो फिर
हम सब क्यों सिर्फ इसी में लगे रह जाते हैं कि कौन सा मंदिर आगे हो गया और कौन सा पीछे , हमारी सोच सिर्फ यहीं आकर क्यूँ सिमट जाती है कि कौन सा मंदिर खजाने में आगे है और कौन सा पीछे ........हम ये क्यों नहीं सोच पाते कि ये पैसा भी काम आ सकता है ....क्या फायदा इतना पैसा मंदिरों में पड़ा सड़ता रहे और देश की गरीब जनता दो वक्त की रोटी के लिए तरसती रहे ...........क्या भगवान पैसा चाहता है या बिना पैसे के खुश नहीं होता? बेशक कहना ये होगा कि लोग चढाते हैं तो कोई क्या करे ? जिनके काम पूरे होते हैं तो वो चढाते हैं इसमें मंदिर का क्या दोष? मगर प्रश्न अब भी अपनी जगह है कि ..........क्या मंदिर के कर्ताधर्ताओं का कोई फ़र्ज़ नहीं बनता? जितना मंदिर की देखभाल और जरूरी खर्चों के लिए जरूरी हो उतना रखकर यदि उस पैसे का सही सदुपयोग करें तो क्या उससे भगवान नाराज हो जायेंगे? क्या उस पैसे को समाज , देश और गरीब जनता के कल्याण के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता? और यदि ऐसा किया जाता है तो ना जाने कितने लोगों का भला होगा और मेरे ख्याल से तो इससे बढ़कर और बेहतर काम दूसरा कोई हो ही नहीं सकता .............मगर ना जाने कब हम ये बात समझेंगे...........अब देखिये जम्मू कश्मीर श्राइन बोर्ड ने जनता कि सुविधा के लिए वहाँ का नक्शा ही बादल दिया चाहे वैष्णो देवी जाना हो या अमरनाथ .......और सबसे बड़ी बात इस कार्य में सरकार ने भी सहयोग दिया .......जब वैष्णो देवी के रास्तों को संवारा गया तब श्री जगमोहन जी ने वहाँ की कायापलट कर दी .......तो क्या और मंदिरों या ट्रस्टों के लोग ऐसा नहीं कर सकते ?............अब चाहे पैसा भ्रष्टाचार के माध्यम से बाहर गया हो या देश के मंदिरों में सड रहा हो क्या फायदा ऐसे पैसे का ? क्या इस पैसे के बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता ? क्या इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई जा सकती ? मेरे ख्याल से तो मेरा देश कल भी सोने की चिड़िया था तो आज भी है जिस देश के मंदिरों में आज भी इतना पैसा बरसता हो वो कैसे गरीब रह सकता है ये तो हमारी ही कमजोरी और लालच है जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है.............आखिर कब हमारी सोच में बदलाव आएगा? आखिर कब हम खुद से ऊपर उठकर देश और समाज के लिए सोचेंगे?
अंजुलि भर पी जाऊँ मै वो नैनन को नीर