Saturday, July 9, 2011

तोसे नैना लड गये जो इक बार

तोसे नैना लड गये जो इक बार
अब खुद को ढूँढे इत उत बावरी बयार
श्याम प्रेम मे री्झ गये दो नैना मतवार
दरस प्यास बुझत नाही चाहे देखे आठों याम


श्याम प्रेम रस माधुरी भीजत है जो इक बार

श्याममय हो जाय है सुध बुध सारी बिसार

मेरी अज्ञान मटकी फ़ोड दयी जा दिन से श्याम
अब श्याम बिना ना दीखत है दिन रात

मन माखन चुराय लिया जा दिना सों श्याम
ह्रदय सिंघासन बैठ गये वा दिना सों श्याम

अपनी सुध बिसार के हो गयी श्याम की डोर
जित ले जायेंगे उडाय के संग चलेगी डोर



नैनन की धोवन मे जब बहते श्याम हो अधीर
अंजुलि भर पी जाऊँ मै वो नैनन को नीर





दोस्तों
इस रसमयी धारा के प्रवाह को आगे बढाने के लिये मै
एक श्रंखला शुरु करने वाली हूँ जिसमे आनन्द की बयार 
बह रही होगी और उम्मीद करती हूँ आप सब का प्यार उसे 
भी इसी तरह मिलता रहेगा………ये शुभ कार्य मै गुरु 
पूर्णिमा से शुरु करने वाली हूँ।

तोसे नैना लड गये जो इक बार

तोसे नैना लड गये जो इक बार
अब खुद को ढूँढे इत उत बावरी बयार
श्याम प्रेम मे री्झ गये दो नैना मतवार
दरस प्यास बुझत नाही चाहे देखे आठों याम


श्याम प्रेम रस माधुरी भीजत है जो इक बार

श्याममय हो जाय है सुध बुध सारी बिसार

मेरी अज्ञान मटकी फ़ोड दयी जा दिन से श्याम
अब श्याम बिना ना दीखत है दिन रात

मन माखन चुराय लिया जा दिना सों श्याम
ह्रदय सिंघासन बैठ गये वा दिना सों श्याम

अपनी सुध बिसार के हो गयी श्याम की डोर
जित ले जायेंगे उडाय के संग चलेगी डोर



नैनन की धोवन मे जब बहते श्याम हो अधीर
अंजुलि भर पी जाऊँ मै वो नैनन को नीर





दोस्तों
इस रसमयी धारा के प्रवाह को आगे बढाने के लिये मै
एक श्रंखला शुरु करने वाली हूँ जिसमे आनन्द की बयार 
बह रही होगी और उम्मीद करती हूँ आप सब का प्यार उसे 
भी इसी तरह मिलता रहेगा………ये शुभ कार्य मै गुरु 
पूर्णिमा से शुरु करने वाली हूँ।

Monday, July 4, 2011

पाठन से उपजा चिन्तन

दोस्तों,
आज की ये रचना एक कविता की उपज है...........मैंने रश्मि प्रभा जी की कविता कैकेयी की ख्वाहिश पढ़ी जिसमे केकैयी के मातृ प्रेम और दर्द को दर्शाया गया था जो सच मे एक अनूठी कल्पना है उसे पढ़कर मुझे ये सारा प्रसंग याद आ गया तो सोचा केकैयी के जीवन का एक उज्जवल पक्ष भी आपके सामने रखना चाहिए .........आखिर उसने ऐसा किया क्यों ? और जब आप ये जानेंगे तो उसके व्यक्तित्व को भी सलाम करेंगे . उम्मीद् करती हूँ रश्मि जी इसे अन्यथा नही लेंगी क्योंकि ये मैने वो ही लिखा है जो मैने कथाओ मे सुन रखा है जिसके बारे मे धर्म ग्रंथों मे वर्णित है।





लिख रही है दुनिया
मन के भावों को
उन अनजानी राहों को
जिन पर चलना मुमकिन ना था
उस दर्द को कह रही है
जो संभव है हुआ ही ना था
कभी किसी ने ना जाना
इतिहास और धर्म ग्रंथों
को नहीं खंगाला
गर खंगाला होता तो
सच जान गए होते
फिर ना ऐसे कटाक्ष होते
हाँ , मैं हूँ केकैयी
जिसने राम को वनवास दिया
और अपने भरत को राज दिया
मगर कोई नहीं जानता
प्रीत की रीतों को
नहीं जानता कोई कैसे
प्रेम परीक्षा दी जाती है
स्व की आहुति दे
हवनाग्नि प्रज्ज्वलित  की जाती है
मेरी प्रीत को तुम क्या जानो
राम की रीत को तुम ना जानो
जब राम को जानोगे
तब ही मुझे भी पहचानोगे
मेरा जीवन धन राम था
मेरा हर कर्म राम था
मेरा तो सर्वस्व  राम था
जो भी किया उसी के लिए किया
जो उसके मन को भाया है
उसी में मैंने जीवन बिताया है
हाँ कलंकनी कहायी हूँ
मगर राम के मन को भायी हूँ
अब और कुछ नहीं चाह थी मेरी
राम ही पूँजी थी मेरी
जानना चाहते हो तो
आज बताती हूँ
तुम्हें राम और मेरी
कथा सुनाती हूँ
जब राम छोटे थे
मुझे मैया कहते थे
मेरे प्राणधन थे
भरत से भी ज्यादा प्रिय थे
बताओ कौन ऐसा जग में होगा
जिसे ना राम प्रिय होगा
हर चीज़ से बढ़कर किसे ना
राम की चाह होगी
बेटे , पति , घर परिवार
कभी किसी को ना
राम से बढ़कर चाहा
मुझमे तो सिर्फ
राम ही राम था समाया
इक दिन राम ने
प्रेम परीक्षा ली मेरी
मुझसे प्रश्न करने लगे
बताओ मैया
कितना मुझे तुम चाहती हो
मेरे लिए क्या कर सकती हो
इतना सुन मैंने कहा
राम तू कहे तो अभी जान दे दूँ
तेरे लिए इक पल ना गंवाऊँगी
जो तू कहे वो ही कर जाऊँगी
राम ने कहा जान तो कोई भी
किसी के लिए दे सकता है
मज़ा तो तब है जब जीते जी 
कांटों की शैया पर सोना होगा
ये ना प्रेम की परिभाषा हुई
इससे बढ़कर तुम क्या कर सकती हो
क्या मेरे लिए अपने पति, बेटे
घर परिवार को छोड़ सकती हो
क्या दुनिया भर का कलंक
अपने सिर ले सकती हो
उसकी बातें सुन मैं सहम गयी
लगा आज राम ने ये कैसी बातें कहीं
फिर दृढ निश्चय कर लिया
मेरा राम मेरा अहित नहीं करेगा
और यदि उसकी इच्छा ऐसी है
तो उसके लिए भी तैयार हुई
कहा राम तेरी हर बात मैं मानूंगी
कहो क्या करना होगा
तब राम यों कहने लगे
मैया सोच लेना
कुछ छोटी बात नहीं माँग रहा हूँ
तुमसे तुम्हारा जीवन माँग रहा हूँ
तुम्हें वैधव्य भी देखना होगा
मेरे लिए क्या ये भी सह पाओगी
अपने पुत्र की नफ़रत सह जाओगी
ज़िन्दगी भर माँ तुम्हे नही कहेगा
क्या ये दुख सह पाओगी
आज मेरे प्रेम की परीक्षा थी
उसमे उत्तीर्ण होने की ठानी थी
कह दिया अगर राम तुम खुश हो उसमे
तो मैं हर दुःख सह जाउंगी
पर तुमसे विलग ना रह पाऊँगी
तुम्हारे प्रेम की प्यासी हूँ
तुम्हारे किसी काम आ सकूँगी
तभी जीवन लाभ पा सकूँगी
कहो क्या करना होगा
तब राम ये कहने लगे
मैया जब मुझे राजतिलक होने लगे
तब तुम्हें भरत को राज दिलाना होगा
और मुझे बनवास भिजवाना होगा
ये सुन मैं सहम गयी
राम वियोग कैसे सह पाऊँगी
राम से विमुख कैसे रह पाऊँगी
तब राम कहने लगे
मैया मैं पृथ्वी का भार हरण करने आया हूँ
इसमें तुम्हारी सहायता की दरकार है
तुम बिन कोई नहीं मेरा
जो इतना त्याग कर सके
तुम पर है भरोसा मैया
इसलिए ये बात कह पाया हूँ
क्या कर सकोगी मेरा इतना काम
ले सकोगी ज़माने भर की
नफ़रत का अपने सिर पर भार
कोई तुम्हारे नाम पर
अपने बच्चों का नाम ना रखेगा
क्या सह पाओगी ये सब व्यंग्य बाण
इतना कह राम चुप हो गए
मैंने राम को वचन दिया
जीवन उनके चरणों मे हार दिया
अपने प्रेम का प्रमाण दिया
तो क्या गलत किया
प्रेम में पाना नहीं सीखा है
प्रेम तो देने का नाम है
और मैंने प्रेम में
स्व को मिटाकर राम को पाया है
मेरा मातृत्व मेरा स्नेह
सब राम में बसता था
तो कहो जगवालों
तुम्हें कहाँ मुझमे
भरत के लिए दर्द दिखता था
मैंने तो वो ही किया
जो मेरे राम को भाया था
मैंने तो यही जीवन धन कमाया था
मेरी राम की ये बात सिर्फ
जानकार ही जानते हैं
जो प्रेम परीक्षा को पहचानते हैं 
ए जगवालों 
तुम न कोई मलाल करना
ज़रा पुरानों में वर्णित
मेरा इतिहास पढ़ लेना
जिसे राम भा जाता है
जो राम का हो जाता है
उसे न जग का कोई रिश्ता सुहाता है
वो हर रिश्ते से ऊपर उठ जाता है
फिर उसे हर शय में राम दिख जाता है
इस तत्वज्ञान को जान लेना
अब तुम न कोई मलाल करना    

पाठन से उपजा चिन्तन

दोस्तों,
आज की ये रचना एक कविता की उपज है...........मैंने रश्मि प्रभा जी की कविता कैकेयी की ख्वाहिश पढ़ी जिसमे केकैयी के मातृ प्रेम और दर्द को दर्शाया गया था जो सच मे एक अनूठी कल्पना है उसे पढ़कर मुझे ये सारा प्रसंग याद आ गया तो सोचा केकैयी के जीवन का एक उज्जवल पक्ष भी आपके सामने रखना चाहिए .........आखिर उसने ऐसा किया क्यों ? और जब आप ये जानेंगे तो उसके व्यक्तित्व को भी सलाम करेंगे . उम्मीद् करती हूँ रश्मि जी इसे अन्यथा नही लेंगी क्योंकि ये मैने वो ही लिखा है जो मैने कथाओ मे सुन रखा है जिसके बारे मे धर्म ग्रंथों मे वर्णित है।





लिख रही है दुनिया
मन के भावों को
उन अनजानी राहों को
जिन पर चलना मुमकिन ना था
उस दर्द को कह रही है
जो संभव है हुआ ही ना था
कभी किसी ने ना जाना
इतिहास और धर्म ग्रंथों
को नहीं खंगाला
गर खंगाला होता तो
सच जान गए होते
फिर ना ऐसे कटाक्ष होते
हाँ , मैं हूँ केकैयी
जिसने राम को वनवास दिया
और अपने भरत को राज दिया
मगर कोई नहीं जानता
प्रीत की रीतों को
नहीं जानता कोई कैसे
प्रेम परीक्षा दी जाती है
स्व की आहुति दे
हवनाग्नि प्रज्ज्वलित  की जाती है
मेरी प्रीत को तुम क्या जानो
राम की रीत को तुम ना जानो
जब राम को जानोगे
तब ही मुझे भी पहचानोगे
मेरा जीवन धन राम था
मेरा हर कर्म राम था
मेरा तो सर्वस्व  राम था
जो भी किया उसी के लिए किया
जो उसके मन को भाया है
उसी में मैंने जीवन बिताया है
हाँ कलंकनी कहायी हूँ
मगर राम के मन को भायी हूँ
अब और कुछ नहीं चाह थी मेरी
राम ही पूँजी थी मेरी
जानना चाहते हो तो
आज बताती हूँ
तुम्हें राम और मेरी
कथा सुनाती हूँ
जब राम छोटे थे
मुझे मैया कहते थे
मेरे प्राणधन थे
भरत से भी ज्यादा प्रिय थे
बताओ कौन ऐसा जग में होगा
जिसे ना राम प्रिय होगा
हर चीज़ से बढ़कर किसे ना
राम की चाह होगी
बेटे , पति , घर परिवार
कभी किसी को ना
राम से बढ़कर चाहा
मुझमे तो सिर्फ
राम ही राम था समाया
इक दिन राम ने
प्रेम परीक्षा ली मेरी
मुझसे प्रश्न करने लगे
बताओ मैया
कितना मुझे तुम चाहती हो
मेरे लिए क्या कर सकती हो
इतना सुन मैंने कहा
राम तू कहे तो अभी जान दे दूँ
तेरे लिए इक पल ना गंवाऊँगी
जो तू कहे वो ही कर जाऊँगी
राम ने कहा जान तो कोई भी
किसी के लिए दे सकता है
मज़ा तो तब है जब जीते जी 
कांटों की शैया पर सोना होगा
ये ना प्रेम की परिभाषा हुई
इससे बढ़कर तुम क्या कर सकती हो
क्या मेरे लिए अपने पति, बेटे
घर परिवार को छोड़ सकती हो
क्या दुनिया भर का कलंक
अपने सिर ले सकती हो
उसकी बातें सुन मैं सहम गयी
लगा आज राम ने ये कैसी बातें कहीं
फिर दृढ निश्चय कर लिया
मेरा राम मेरा अहित नहीं करेगा
और यदि उसकी इच्छा ऐसी है
तो उसके लिए भी तैयार हुई
कहा राम तेरी हर बात मैं मानूंगी
कहो क्या करना होगा
तब राम यों कहने लगे
मैया सोच लेना
कुछ छोटी बात नहीं माँग रहा हूँ
तुमसे तुम्हारा जीवन माँग रहा हूँ
तुम्हें वैधव्य भी देखना होगा
मेरे लिए क्या ये भी सह पाओगी
अपने पुत्र की नफ़रत सह जाओगी
ज़िन्दगी भर माँ तुम्हे नही कहेगा
क्या ये दुख सह पाओगी
आज मेरे प्रेम की परीक्षा थी
उसमे उत्तीर्ण होने की ठानी थी
कह दिया अगर राम तुम खुश हो उसमे
तो मैं हर दुःख सह जाउंगी
पर तुमसे विलग ना रह पाऊँगी
तुम्हारे प्रेम की प्यासी हूँ
तुम्हारे किसी काम आ सकूँगी
तभी जीवन लाभ पा सकूँगी
कहो क्या करना होगा
तब राम ये कहने लगे
मैया जब मुझे राजतिलक होने लगे
तब तुम्हें भरत को राज दिलाना होगा
और मुझे बनवास भिजवाना होगा
ये सुन मैं सहम गयी
राम वियोग कैसे सह पाऊँगी
राम से विमुख कैसे रह पाऊँगी
तब राम कहने लगे
मैया मैं पृथ्वी का भार हरण करने आया हूँ
इसमें तुम्हारी सहायता की दरकार है
तुम बिन कोई नहीं मेरा
जो इतना त्याग कर सके
तुम पर है भरोसा मैया
इसलिए ये बात कह पाया हूँ
क्या कर सकोगी मेरा इतना काम
ले सकोगी ज़माने भर की
नफ़रत का अपने सिर पर भार
कोई तुम्हारे नाम पर
अपने बच्चों का नाम ना रखेगा
क्या सह पाओगी ये सब व्यंग्य बाण
इतना कह राम चुप हो गए
मैंने राम को वचन दिया
जीवन उनके चरणों मे हार दिया
अपने प्रेम का प्रमाण दिया
तो क्या गलत किया
प्रेम में पाना नहीं सीखा है
प्रेम तो देने का नाम है
और मैंने प्रेम में
स्व को मिटाकर राम को पाया है
मेरा मातृत्व मेरा स्नेह
सब राम में बसता था
तो कहो जगवालों
तुम्हें कहाँ मुझमे
भरत के लिए दर्द दिखता था
मैंने तो वो ही किया
जो मेरे राम को भाया था
मैंने तो यही जीवन धन कमाया था
मेरी राम की ये बात सिर्फ
जानकार ही जानते हैं
जो प्रेम परीक्षा को पहचानते हैं 
ए जगवालों 
तुम न कोई मलाल करना
ज़रा पुरानों में वर्णित
मेरा इतिहास पढ़ लेना
जिसे राम भा जाता है
जो राम का हो जाता है
उसे न जग का कोई रिश्ता सुहाता है
वो हर रिश्ते से ऊपर उठ जाता है
फिर उसे हर शय में राम दिख जाता है
इस तत्वज्ञान को जान लेना
अब तुम न कोई मलाल करना    

Saturday, July 2, 2011

आखिर कब तक ऐसा होगा?


(केरल में 18 वीं सदी में बने पद्मनाभास्वामी मंदिर के तहखाने से निकला एक टन सोना, 50000 करोड़ का खजाना बड़ी मात्र में हीरे जवाहरात , ९ फुट लम्बी सोने कि चैन, हजारों साल पुराने सोने के सिक्के  और ना जाने क्या क्या निकला है और दूसरा तहखाना खोला जाना बाकी है
ऐसे में कहा जा रहा है कि इस दौलत के दम पर पद्मनाभास्वामी मंदिर ट्रस्ट तिरुपति बालाजी ट्रस्ट को दौलत के मामले में पीछे छोड़कर देश का सबसे धनवान ट्रस्ट का खिताब हासिल कर सकता है। )


अभी ऊपर लिखी ये पोस्ट पढ़ी रूबी सिन्हा की........तो ये ख्याल आया
आखिर कब तक ऐसा होगा?

आज जहाँ देखो वहाँ जिस मंदिर में देखो वहीँ हर जगह सिर्फ यही सुनने को मिलता है कि अमुक मंदिर में  इतने किलो का मुकुट या इतने किलो की चेन चढ़ाई गयी .......
मंदिरों में इतना पैसा होना क्या आश्चर्य की बात नहीं है ? सभी जानते हैं कि  मंदिरों में श्रद्धालु अपनी कामना पूरी होने पर कुछ ना कुछ चढाते ही हैं  लेकिन मेरा कहना है कि यदि इतना पैसा मंदिरों में  है तो फिर 
हम सब क्यों सिर्फ इसी में लगे रह जाते हैं कि कौन सा मंदिर आगे हो गया और कौन सा पीछे , हमारी सोच सिर्फ यहीं आकर क्यूँ सिमट जाती है कि कौन सा मंदिर खजाने में आगे है और कौन सा पीछे ........हम ये क्यों नहीं सोच पाते कि ये पैसा भी काम आ सकता है  ....क्या फायदा इतना पैसा मंदिरों में पड़ा सड़ता रहे और देश की गरीब जनता दो वक्त की रोटी के लिए तरसती रहे ...........क्या भगवान पैसा चाहता है या बिना पैसे के खुश नहीं होता? बेशक कहना ये होगा कि लोग चढाते हैं तो कोई क्या करे ? जिनके काम पूरे होते हैं तो वो चढाते हैं इसमें मंदिर का क्या दोष? मगर प्रश्न अब भी अपनी जगह है कि ..........क्या मंदिर के कर्ताधर्ताओं का कोई फ़र्ज़ नहीं बनता?  जितना मंदिर की देखभाल और जरूरी खर्चों के लिए जरूरी हो उतना रखकर यदि उस पैसे का सही सदुपयोग करें तो क्या उससे भगवान नाराज हो जायेंगे? क्या उस पैसे को समाज , देश और गरीब जनता के कल्याण के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता? और यदि ऐसा किया जाता है तो ना जाने कितने लोगों का भला होगा और मेरे ख्याल से तो इससे बढ़कर और बेहतर काम दूसरा कोई हो ही नहीं सकता .............मगर ना जाने कब हम ये बात समझेंगे...........अब देखिये जम्मू कश्मीर श्राइन बोर्ड ने जनता कि सुविधा के लिए वहाँ का नक्शा ही बादल दिया चाहे वैष्णो देवी जाना हो या अमरनाथ .......और सबसे बड़ी बात इस कार्य में सरकार ने भी सहयोग दिया .......जब वैष्णो देवी के रास्तों को संवारा गया तब श्री जगमोहन जी ने वहाँ की कायापलट कर दी  .......तो क्या और मंदिरों या ट्रस्टों  के लोग ऐसा नहीं कर सकते ?............अब चाहे पैसा भ्रष्टाचार के माध्यम से बाहर गया हो या देश के मंदिरों में सड रहा हो क्या फायदा ऐसे पैसे का ? क्या इस पैसे के बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता ? क्या इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई जा सकती ?  मेरे ख्याल से तो मेरा देश कल भी सोने की चिड़िया था तो आज भी है जिस देश के मंदिरों में आज भी इतना पैसा बरसता हो वो कैसे गरीब रह सकता है ये तो हमारी ही कमजोरी और लालच है जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है.............आखिर कब हमारी सोच में बदलाव आएगा? आखिर कब हम खुद से ऊपर उठकर देश और समाज के लिए सोचेंगे?

आखिर कब तक ऐसा होगा?


(केरल में 18 वीं सदी में बने पद्मनाभास्वामी मंदिर के तहखाने से निकला एक टन सोना, 50000 करोड़ का खजाना बड़ी मात्र में हीरे जवाहरात , ९ फुट लम्बी सोने कि चैन, हजारों साल पुराने सोने के सिक्के  और ना जाने क्या क्या निकला है और दूसरा तहखाना खोला जाना बाकी है
ऐसे में कहा जा रहा है कि इस दौलत के दम पर पद्मनाभास्वामी मंदिर ट्रस्ट तिरुपति बालाजी ट्रस्ट को दौलत के मामले में पीछे छोड़कर देश का सबसे धनवान ट्रस्ट का खिताब हासिल कर सकता है। )


अभी ऊपर लिखी ये पोस्ट पढ़ी रूबी सिन्हा की........तो ये ख्याल आया
आखिर कब तक ऐसा होगा?

आज जहाँ देखो वहाँ जिस मंदिर में देखो वहीँ हर जगह सिर्फ यही सुनने को मिलता है कि अमुक मंदिर में  इतने किलो का मुकुट या इतने किलो की चेन चढ़ाई गयी .......
मंदिरों में इतना पैसा होना क्या आश्चर्य की बात नहीं है ? सभी जानते हैं कि  मंदिरों में श्रद्धालु अपनी कामना पूरी होने पर कुछ ना कुछ चढाते ही हैं  लेकिन मेरा कहना है कि यदि इतना पैसा मंदिरों में  है तो फिर 
हम सब क्यों सिर्फ इसी में लगे रह जाते हैं कि कौन सा मंदिर आगे हो गया और कौन सा पीछे , हमारी सोच सिर्फ यहीं आकर क्यूँ सिमट जाती है कि कौन सा मंदिर खजाने में आगे है और कौन सा पीछे ........हम ये क्यों नहीं सोच पाते कि ये पैसा भी काम आ सकता है  ....क्या फायदा इतना पैसा मंदिरों में पड़ा सड़ता रहे और देश की गरीब जनता दो वक्त की रोटी के लिए तरसती रहे ...........क्या भगवान पैसा चाहता है या बिना पैसे के खुश नहीं होता? बेशक कहना ये होगा कि लोग चढाते हैं तो कोई क्या करे ? जिनके काम पूरे होते हैं तो वो चढाते हैं इसमें मंदिर का क्या दोष? मगर प्रश्न अब भी अपनी जगह है कि ..........क्या मंदिर के कर्ताधर्ताओं का कोई फ़र्ज़ नहीं बनता?  जितना मंदिर की देखभाल और जरूरी खर्चों के लिए जरूरी हो उतना रखकर यदि उस पैसे का सही सदुपयोग करें तो क्या उससे भगवान नाराज हो जायेंगे? क्या उस पैसे को समाज , देश और गरीब जनता के कल्याण के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता? और यदि ऐसा किया जाता है तो ना जाने कितने लोगों का भला होगा और मेरे ख्याल से तो इससे बढ़कर और बेहतर काम दूसरा कोई हो ही नहीं सकता .............मगर ना जाने कब हम ये बात समझेंगे...........अब देखिये जम्मू कश्मीर श्राइन बोर्ड ने जनता कि सुविधा के लिए वहाँ का नक्शा ही बादल दिया चाहे वैष्णो देवी जाना हो या अमरनाथ .......और सबसे बड़ी बात इस कार्य में सरकार ने भी सहयोग दिया .......जब वैष्णो देवी के रास्तों को संवारा गया तब श्री जगमोहन जी ने वहाँ की कायापलट कर दी  .......तो क्या और मंदिरों या ट्रस्टों  के लोग ऐसा नहीं कर सकते ?............अब चाहे पैसा भ्रष्टाचार के माध्यम से बाहर गया हो या देश के मंदिरों में सड रहा हो क्या फायदा ऐसे पैसे का ? क्या इस पैसे के बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता ? क्या इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई जा सकती ?  मेरे ख्याल से तो मेरा देश कल भी सोने की चिड़िया था तो आज भी है जिस देश के मंदिरों में आज भी इतना पैसा बरसता हो वो कैसे गरीब रह सकता है ये तो हमारी ही कमजोरी और लालच है जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है.............आखिर कब हमारी सोच में बदलाव आएगा? आखिर कब हम खुद से ऊपर उठकर देश और समाज के लिए सोचेंगे?

Friday, June 24, 2011

ललिता पूछे राधा से , ए राधा

ललिता पूछे राधा से , ए राधा
कौन शरारत कर गया
तेरे ख्वाबों में ,ख्वाबों में

आँख का अंजन बिखेर गया गालों पे-२-
ये चेहरा कैसे उतर गया ए राधा
दो नैनों में नीर कौन दीवाना भर गया ए राधा
ललिता पूछे राधा से ए राधा ...............


वो छैल छबीला आया था ओ ललिता -२-
मन मेरा भरमाया था ओ ललिता
मुझे प्रेम सुधा पिलाया था ओ ललिता
मेरी सुध बुध सब बिसराय गया वो छलिया
मेरा चैन वैन सब छीन गया री ललिता
ललिता पूछे राधा से ए राधा..................

वो मुरली मधुर बजाय गया सुन ललिता
वो प्रेम रस  पिलाय गया ओ ललिता
मुझे अपना आप भुलाय गया ओ ललिता
मुझे मोहिनी रूप दिखाय गया ओ ललिता
बंसी की धुन सुनाय गया सुन ललिता
और चित मेरा चुराय गया वो छलिया
ललिता पूछे राधा से ए राधा ..............

अब ध्यानमग्न मैं बैठी हूँ सुन ललिता
उसकी जोगन बन बैठी हूँ सुन ललिता
ये कैसा रोग लगाय गया ओ ललिता
ये कैसा रास रचाए गया ओ ललिता
मोहिनी चितवन डार गया सुन ललिता
ये कैसी प्रीत सुलगाय गया वो छलिया
मुझे अपनी जोगन बनाय गया री ललिता
ललिता पूछे राधा से ए राधा ..............

अब हाथ छुडाय भाग गया वो छलिया
मुझे प्रेम का रोग लगाय गया वो छलिया
मेरी रूप माधुरी चुराय गया वो छलिया
मुझे कमली अपनी बनाय गया वो छलिया
अब कैसे धीरज बंधाऊं री ललिता
अब कैसे प्रीत पहाड़ चढाऊँ री ललिता
मोहे प्रीत की डोर से बाँध गया वो छलिया
मेरी सुध बुध सब बिसराय गया वो छलिया
ललिता पूछे राधा से ए राधा .................