Thursday, July 12, 2012


इधर इन्द्र की पूजा ना होने पर
इन्द्र को आश्चर्य हुआ
ये ब्रजवासियों ने किसका है पूजन किया
जब इन्द्र को पता चला
क्रोधित हो उसने
मेघराज को आदेश दिया
ये ब्रजवासी अति उद्दंडी हुये
अभिमान मे चूर चूर हुये
एक बालक की बातों मे आ गये
बरसों की परम्परा को
उन्होने है तोडा
अब इसका दण्ड उन्हे भुगतना होगा
कह मेघराज को आदेश दिया
उनचासों पवनों को भी
मेघराज के साथ कर दिया
सरदी पानी से कोई
जीना ना बच पाये
ब्रजवासियों संग गोवर्धन भी बह जाये
मूसलाधार वर्षा करते मेघों ने
ब्रजमण्डल को घेरा था
पवन ने भी प्रचण्ड वेग धारण कर
मेघराज का साथ दिया था
ये देख केशवमूर्ति हँसकर
बलराम जी से बोले
देखो नादान इन्द्र क्या करता है
हमारा क्रोध ब्रजवासियो पर मढता है
जब सरदी बारिश से
ब्रजवासी व्याकुल हुए
तब सभी मोहन की शरण मे आ गये
तुमने इन्द्र की पूजा है छुडवाई
देखो उसने कैसी तबाही है मचाई
अब अपने गिरिराज से कहो
वो ही रक्षा करें हमारी
वरना गोधन सहित
सभी ब्रजवासियों का
मरण पक्का समझो
तब कान्हा ने समझाया
सब गौ बछ्डे साथ ले
गोवर्धन्न की तलहटी मे पहुँचे
वहाँ कान्हा ने गोवर्धन को
उठाने को कहा
मगर वो 21 किलोमीटर का पहाड
ना टस से मस हुआ
तब कान्हा ने अपनी ऊँगली लगाई
देखते देखते पहाड उँगली पर आ गया
तब सब ग्वाल बालों ने भी
अपने बाँस आदि लगाये
सारे ब्रजवासी उसके नीचे सुरक्षित हुये
साथ ही प्रभु ने
सुदर्शन को आदेश दिया
एक बूंद पानी ना गिरने पावे
ब्रज मे ना कोई नुकसान होने पावे
सुदर्शन पानी को काटे जाता था
साथ ही आज प्रभु को
एक और लीला करनी थी
अपने एक भक्त की
प्यास भी पूरण करनी थी
रामावतार मे सीता मैया ने
अगस्त ॠषि को
भोजन पर बुलाया
जब अगस्त मुनि भोजन करने बैठे
तो देखते देखते अन्न भण्डार कम पडे
जितना मैया बनाती थी
वो भी खत्म किये जाते थे
अगस्त बाबा तो जैसे
जन्मो की साध पूरी किये जाते थे
जगतजन्नी के हाथों भोजन
सबको नसीब कहाँ होता है
आज अपने भाग्य को सराहे जाते थे
और भोजन का आनन्द लिये जाते थे
जब सुबह से शाम हुई
पर बाबा की ना तृप्ति हुई
तब सीता मैया घबरा गयी
और राम जी से कर जोड
विनती करने लगी
प्रभु ये क्या चमत्कार है
अब आप ही संभालो
इनका ना पाया जाता पार है
जैसे ही अगस्त बाबा ने पानी मांगा
तभी राम जी ने उन्हे कहा
बाबा पानी के लिये तुम्हें
इन्तज़ार करना होगा
जब मै कृष्ण जन्म मे आऊँगा
इतना पानी पिलवाऊँग़ा
जन्म जन्म की प्यास मिट जायेगी
इतना वचन दे अगस्त बाबा को विदा किया
आज वो ही वक्त था आया
अगस्त बाबा को कान्हा ने था बुलाया
अगस्त बाबा ने
अंजुलि भर भर पानी पीया था
सात दिन और सात रात तक
पानी था बरसा
आज बाबा की प्यास को था विराम मिला
इधर कान्हा की बाली उमरिया
उस पर गोवर्धन को था धारण किया
ये देख देख मैया घबराती थी
सबसे बस यही गुहार लगाती थी
ब्रजवासियों कान्हा का ध्यान धरो
देखो मेरो छोटो सो लाला है
तुम सब तो खाते पीते रहते हो
और वो देखो अकेला ज़रा भी ना हिलता है
तुम्हारी रक्षा को तत्पर रहता है
ये सुन गोप बोल पडे
अरे कन्हैया तू हट जा भैया
हम सब मिल कर उठा लेंगे
कान्हा ने समझाया
मेरे बिना ना तुम्हारा काम चलेगा
मगर जब सब ना माने
और कान्हा ने जैसे ही
अपनी ऊँगली खिसकायी
तड तड करती सबकी
लकडियाँ लाठियाँ टूटने लगीं
ये देख सभी चिल्लाये
अरे कान्हा संभाल भाई
हमसे ना गोवर्धन संभाला जाये
यहाँ गोवर्धन कोई और नही
मानुष तन को है बतलाया
और जिसने इसे धारण कर रखा है
     अर्थात उठा रखा है
वो ही परब्रह्म परमेश्वर है
गर वो शरीर से निकल जाये
तो जिस्म बेजान हो जाये
सात कोस का पहाड और कुछ नही ये शरीर ही है
जिसमे गोविन्द समाये हैं
गर अपने अंगुल से इसे नापेंगे
तो सात अंगुल मे ही
नख से शिख तक नाप लेंगे
प्रकट क्यों नही होते
क्योंकि हमारी आँख है खराब
जिस पर हमने है लगायी
विषयों की पट्टी
जिससे दिखता नही कुछ भी
और मै- मै करता मानव जीता है
पर प्रभु को ना पूर्ण समर्पण करता है
इधर मैया और गोपों को आश्चर्य हुआ
कैसे नन्हे से कान्हा ने
गोवर्धन उठा लिया
जब कान्हा ने देखा
ये मुझे देवता समझने लगे
तो अपनी मीठी बातों से
सबको मोहित किया
गोप कहते कान्हा कहो कैसे
तुमने गोवर्धन लिया उठाय
सुन कान्हा मुस्कुराकर बोले
एक तो तुम लोगों के माखन से
मेरा बल बढा
दूसरे तुम गोपों ने भी तो
सहायता की
तीसरे राधा रानी की कृपा से
मैने गिरिवर लिया उठाय
क्योंकि
बृषभानु ललि वहाँ पधारी थीं
जिन्हे देख कान्हा की मति भरमाई
तभी गिरिराज डोलने लगे
ये देख सबके दिल हिलने लगे
तब सखियाँ राधा को पकड
कीर्ति जी के पास ले गयीं
बृषभानु लली को ना
कान्हा के पास जाने दिया
तब कान्हा का मन स्थिर हुआ
इस तरह सात दिन सात रात
मूसलाधार पानी बरसता रहा
सुदर्शन चक्र और अगस्त मुनि ने
सारा भार संभाला था
एक बूंद पानी ना
ब्रज मे गिरने पाया था
इन्द्र ने अपनी हर संभव
कोशिश करके देख ली
तब इन्द्र को भान हुआ
ये मुझसे क्या गलत हुआ
तुरन्त गुरु बृहस्पति के पास गया
अपने से बडे आदमी की कोई
गलती गर हो जाये
गुरुदेव बतलाइये
कैसे वो सुधारी जाये
जिसका दूसरा आदमी
सम्मान करता हो
उसे आगे करके ले जाओ
गुरु ने था उपाय बताया
सुन इन्द्र गौ माता की पूंछ पकड
गोविन्द के पास पहुँचा
जैसे ही प्रभु ने
गौ माता को देखा
गलबहियाँ डाल उनसे लिपट गये
क्योंकि गाय प्रभु की इष्ट है
ये बात इंद्र को पता चल गयी थी
इसलिये इंद्र ने गाय की पूंछ पकड ली थी
इधर मौका पाकर इंद्र ने
प्रभु के चरण पकडे
रोकर अनुनय विनय करने लगा
हे प्रभु दीनानाथ निरंजन निरंकार
आपको बारम्बार प्रणाम है
मै अज्ञानी आप का पार
कैसे पा सकता हूँ
अज्ञानतावश जो कर्म किया
उसकी क्षमा चाहता हूँ
मुझमे अपने पद का
अभिमान समाया था
जिसे प्रभु ने चूर चूर किया
हम आपके बालक हैं
प्रभु क्षमा करो
गर्भ मे भी बालक
उल्टा सीधा हो जाता है
तो भी ना माँ का
वात्सल्य कम होता है
ऐसे ही हम आपके
गर्भ मे समाये बालक हैं
प्रभु कर जोड क्षमा
मांगने आया हूँ
आपके सिवा ना
तीनो लोकों मे कोई दूजा है
आपकी दया से ही मैने
इंद्र पद पाया था
हे मुरलीधर मेरा अपराध
अब क्षमा करो
तभी कामधेनु गौ भी बोल पडी
प्रभु मै ब्रह्मा की भेजी
आपके सम्मुख आई हूँ
छोटों के अपराध
बडे क्षमा करते आये हैं
दयालु कृपानिधान
अपना नाम सार्थक करो
तब प्रसन्न हो कान्हा बोल उठे
अभिमानी के दंभ का
हरण मै करता हूँ
जो भी अहंकार करे
उसके गर्व को तोड देता हूँ
तुम्हारा अपराध यद्यपि
क्षमा योग्य नही था
मगर तुमने मेरे सभी भक्तों को
गोवर्धन के नीचे एकत्र किया
इसलिये तुम्हारा अपराध
क्षमा करता हूँ
वरना ब्रह्मा का अपराध
ना मैने क्षमा किया था
क्योंकि उसने मम भक्तों को
मुझसे दूर किया था
जो भी भक्तों का अपराध करता है
वो ना मुझे भाता है
आगे से इतना ध्यान रखना
मेरे भक्तों को ना
कभी तंग करना
फिर कामधेनु और इन्द्र ने
प्रभु का पूजन वन्दन किया
और गौ दुग्ध से अभिषेक किया
प्रभु गुण गाते अपने धाम को गये
प्रभु के अलौकिक कर्म देख
ब्रजवासियों को आश्चर्य हुआ
और सबने मिलकर
नन्दबाबा को घेर लिया
बाबा तुम्हारा पुत्र ना
साधारण दिखता है
ये जरूर किसी देवता का
अवतार हुआ है
जब से जन्म लिया
तब से अलौकिक लीला करता है
साधारण मनुष्य के बस की
तो कोई बात नही
इसने खेल खेल मे
इतने राक्षसो का है उद्धार किया
हमे दावानल से भी बचाया
कालियनाग के विष से
यमुना को मुक्त कराया
इतनी छोटी उम्र मे इसने
इतने बडे गिरिराज को है उठा लिया
सच सच बोलो बाबा
ये कौन है , कहाँ से आया है
कहीं साक्षात नारायण ने ही तो
नही अवतार लिया है
गोपों की बातें सुन
नन्दबाबा बोल पडे
गर्ग मुनि जब आये थे
तब उन्होने विलक्षण लक्षण
इसके बतलाये थे
वो बातें ना मैने किसी को बताई थीं
पर तुम्हारी शंका निवारण को
आज बतलाता हूँ
उन्होने बतलाया था
तुम्हारा ये बालक
हर युग मे
अलग अलग रुपों मे आता है
कभी श्वेत वर्ण , कभी रक्त
तो कभी पीत वर्ण ये पाता है
इस बार कृष्ण वर्ण मे आया है
जो सबके मन को भाया है
पहले कभी वसुदेव के
यहाँ भी इसने जन्म लिया था
तभी इस बालक का नाम
वासुदेव पडा था
और गुणों और कर्मो के अनुरूप
इसके नाम पडते जायेंगे
मै तो उन नामो को जानता हूँ
पर साधारण जन ना जान पायेंगे
ये सबका कल्याण करेगा
बडी बडी बाधाओ को पार करेगा
सबको आनन्दित करेगा
चाहे जिस दृष्टि से देखो
गुण , सौन्दर्य , ऐश्वर्य , कीर्ति या प्रभाव
तुम्हारा बालक नारायण के समान
गुणों वाला है
इसलिये इसके अलौकिक कार्य देख
ना शंका करना
दिव्य बालक ने है तुम्हारे यहाँ जन्म लिया
मगर ये बात ना किसी से कहना
तब से मै इसे नारायण का
अंश की समझता हूँ
और इसके बारे मे
ना किसी से कहता हूँ
नन्दबाबा की बातें सुन
सभी गोप विस्मित हुये
और आनन्दित हो
कान्हा की प्रशंसा करने लगे



Monday, July 9, 2012

कृष्ण लीला ………भाग 55




एक दिन इन्द्र पूजा का दिन आया
वृन्दावन वासियों ने अनेक पकवान बनाये 
यशोदा मैया भी उस दिन
भिन्न भिन्न पकवान बनाती थीं
सब की तैयारी देख
कन्हैया ने विचार किया 
ये अज्ञानी ग्रामवासी 
डर के पूजा करते हैं
किस कार्य से क्या होगा
इसका ना महत्त्व समझते हैं
पुरातन रीती अपनाये जाते हैं
पूजा शास्त्र सम्मत होनी चाहिए
ना कि डर से 
आज इन्हें समझाना होगा
पूजा का महत्त्व इन्हें बतलाना होगा
ये सोच कान्हा पहुंचे मैया के पास
रोज कान्हा गौ चरा 
मैया के पास चले आते थे
आज जब कान्हा उनकी तरफ आने लगे
ये देख मैया ने रोक दिया
कान्हा आज मेरे पास मत आना
जय जय के लिए भोग बनाती हूँ
मुझे तुम मत छूना
मगर कान्हा ने मैया की बात ना मानी
और फिर मैया की तरफ कदम बढ़ाने लगे
मैया माना करती रही
डांट लगाती रही
मगर कान्हा ने एक ना मानी 
ये देख मैया को क्रोध इतना आया
आज मैया ने कान्हा के गाल पर चपत लगाया 
कान्हा थप्पड़ खा 
बिलख- बिलख कर रोने लगे
रोते- रोते नन्द बाबा के 
पास पहुँच गए 
वहाँ भी देखा
लोग नए- नए पकवान बनाते थे
जैसे नन्द बाबा ने देखा
कान्हा को रोते
तुरंत गोद में उठा लिया
और रोने का कारण पूछा
अब तो कान्हा बोल पड़े
बाबा रोने का कारण बाद में पूछना
पहले ये बतलाओ
ये सब यहाँ क्या होता है
तब नंद बाबा ने बतलाया
ये जय- जय के लिए भोग बनाया है
सुन कान्हा बोल पड़े
इसी जय- जय ने तो 
आज पिटवाया है
कौन है ये जय -जय बाबा
हमारे लिए क्या करता है
सुन नन्द बाबा ने बतलाया
इन्द्र देवता की 
हम सब पूजा करते हैं
फिर वो पूजा से खुश होकर
पानी बरसाता है
जिससे हमारा प्रदेश
धन-धान्य से 
परिपूर्ण हो जाता है
ये सुन कान्हा बोल उठे
क्यों जान- बूझकर
कुराह पर सब चलते हैं
संसार में धर्म और कर्म
तीन तरह के होते हैं
एक वेद व् शास्त्रानुसार
दूजा लोक व्यवहार
और तीसरा अपने मन से 
कार्य करना 
सो वेदानुसार कार्य करने से ही
शुभ फल मिला करता है
फिर भला इंद्र की 
पूजा से क्या मिलेगा
ना वो किसी को
भक्ति, मुक्ति या वरदान 
दे सकता है
वो तो खुद सौ यज्ञ 
करने पर इन्द्रासन पाता है
तभी सभी देवता उसे 
अपना राजा मानते हैं
जो दैत्यों से लडाई  में
खुद जा छिप जाता है
और नारायण की सहायता से
पुनः इन्द्रासन पाता है
ऐसे निर्बल की क्यों 
तुम सब पूजा करते हो
धर्मानुसार परमेश्वर की
पूजा क्यों नहीं करते हो
जो अज्ञानी नारायण को छोड़
दूसरे देवों को पूजा करते हैं
उन्हें मूर्ख समझना चाहिए
जब प्रभु इच्छा बिना
पत्ता तक नहीं हिल सकता
फिर कोई किसी को
सुख- दुःख भला क्या देगा
जो होता है परमेश्वर की
इच्छानुसार होता है
जो कर्म में लिखा गया
वो तिल भर भी
ना घटता - बढ़ता है
सुख- संपत्ति घर- परिवार
वस्तुएं सब धर्म -कर्म से मिलती हैं
फिर बताओ इसमें
इंद्र ने क्या नया किया
उसे तो सिंचाई मंत्री 
है बनाया गया
उसका कार्य है वर्षा करना
गर इसमें वो कोताही बरतेगा
नारायण के कोप का भाजन होगा
अपने वर्णानुसार धर्म को ना छोडो
खेती व्यापार गौ सेवा करना ही
वैश्य का धर्म होता
और हमें सारी सुख समृद्धि 
ये गोवर्धन पर्वत ही देता
इससे  ही हमारा गौ धन
फलता -फूलता 
गौ बछड़े यहीं चरा करते
फिर भर -भर कर 
दूध -घी दिया करते
जिससे सबका जीवन चलता
क्यों ना हम सभी
इसी पर्वत की पूजा करें
ये सुन ग्रामवासी खुश हुए
और नंदबाबा से बोल पड़े
नंदबाबा बेशक बालक है छोटा
पर बात पते की है कहता


सबने कहा कन्हैया
ये तो बतलाओ
गर इन्द्र नाराज हुआ
तो क्या तुम्हारा गोवर्धन
हमारी रक्षा करेगा
सुन कान्हा ने हामी भरी
एक ग्वाल ने कहा
तुम्हारे गोवर्धन की
पूजा को हैं हम तैयार
मगर उसे सामने आकर
भोग लगाना होगा
कान्हा ने वो भी है
स्वीकार किया
तीसरी बात ग्वाल बालों ने ये कही
तुम्हारे गोवर्धन को क्या भाता है
५६ प्रकार का भोजन
हमारा गोवर्धन करता है
कान्हा ने बतलाया
और ५६ प्रकार के 
भोजन का अर्थ
गुनीजनों ने है ये बतलाया
पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (5)
पांच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन (6)
पांच और छः होते हैं ग्यारह 
इस तरह मिलाकर हो गया 
५६ प्रकार का भोजन
जहाँ मन ,वचन और कर्म से 
प्रभु को पूर्ण समर्पण किया
जीव का वो ही प्रभु को
५६ प्रकार का भोजन हुआ
सर्वस्व समर्पण का भाव ही
प्रभु ने  है बतलाया
पर इतनी सी बात ही
जीव ना कभी समझ पाया
अब ग्वालों ने कहा
देखो कान्हा 
पहली बार पूजा करेंगे
कोई त्रुटि हुई तो
तुम्हारे देव हमें क्षमा करेंगे
कान्हा ने कहा
तुम्हारी ये बात 
नहीं मानी जा सकती
पूजा तो शास्त्र सम्मत करनी होगी
सुन गोप बोले वो तो
हमें नहीं है आती
तब कान्हा ने बतलाया
जैसे- जैसे कहता जाऊँ
तुम वैसा करते जाना
सुन सबके मन हर्षाये
और सामग्री गाडी बैलों पर 
लदवा दिया
उत्तम वस्त्राभूषण पहन
सबने गोवर्धन को 
प्रस्थान किया
सबने मिल सबसे पहले
गोवर्धन को स्नान कराया
पर इतने बड़े पहाड़ पर ना
कोई असर हुआ
जब तक पानी भर कर लाते थे
तब तक गोवर्धन सूख जाते थे
सुबह से शाम हुई
पर गोवर्धन पर्वत की तो
मूंछ भी ना गीली हुई
ग्रामवासी थक हार गए
कान्हा से गुहार लगायी
देख भैया हम से तो अब
और पानी ढोया जाता नहीं
और तेरे गोवर्धन पर तो
कुछ भी असर होता नहीं
सुन कान्हा बोले अगर
पानी का इंतजार पास हो जाये
तो बोलो कुछ समस्या रहेगी
सुन ग्रामवासी प्रसन्न हुए
सबको आँख बंद करवाई
और मन से ही मनहरण प्यारे ने
मानसी गंगा उपजाई
अब सबने मिल गोवर्धन को
स्नान कराया
शास्त्र सम्मत विधि से पूजा किया
जैसे ही भोग लगाने को उद्यत हुए
ये देख गिरिराज स्वयं प्रकट हुए
ब्रजवासी ये देख अति आनंदित हुए
गिरिराज कोई और नहीं
स्वयं कान्हा ने ही 
रूप बनाया था
और अति हर्षित हो
ब्रजवासियों के भोजन का
भोग लगाया था
मांग -मांग कर खाते थे
विविध पकवानों का
स्वाद उठते थे
ब्रजवासियों को अपनी
गलती का अहसास हुआ
व्यर्थ ही इतने साल
इन्द्र का पूजन किया
जिसने ना कभी दर्शन दिया
गिरिराज का आज ही
पूजन किया
उसने तो स्वयं प्रकट हो
भोजन किया
ये बात सबके मन को भा गयी
अति हर्षित हो सभी
गिरिराज का पूजन कर
ब्रज में लौट आये



क्रमश: ……………


कृष्ण लीला ………भाग 55




एक दिन इन्द्र पूजा का दिन आया
वृन्दावन वासियों ने अनेक पकवान बनाये 
यशोदा मैया भी उस दिन
भिन्न भिन्न पकवान बनाती थीं
सब की तैयारी देख
कन्हैया ने विचार किया 
ये अज्ञानी ग्रामवासी 
डर के पूजा करते हैं
किस कार्य से क्या होगा
इसका ना महत्त्व समझते हैं
पुरातन रीती अपनाये जाते हैं
पूजा शास्त्र सम्मत होनी चाहिए
ना कि डर से 
आज इन्हें समझाना होगा
पूजा का महत्त्व इन्हें बतलाना होगा
ये सोच कान्हा पहुंचे मैया के पास
रोज कान्हा गौ चरा 
मैया के पास चले आते थे
आज जब कान्हा उनकी तरफ आने लगे
ये देख मैया ने रोक दिया
कान्हा आज मेरे पास मत आना
जय जय के लिए भोग बनाती हूँ
मुझे तुम मत छूना
मगर कान्हा ने मैया की बात ना मानी
और फिर मैया की तरफ कदम बढ़ाने लगे
मैया माना करती रही
डांट लगाती रही
मगर कान्हा ने एक ना मानी 
ये देख मैया को क्रोध इतना आया
आज मैया ने कान्हा के गाल पर चपत लगाया 
कान्हा थप्पड़ खा 
बिलख- बिलख कर रोने लगे
रोते- रोते नन्द बाबा के 
पास पहुँच गए 
वहाँ भी देखा
लोग नए- नए पकवान बनाते थे
जैसे नन्द बाबा ने देखा
कान्हा को रोते
तुरंत गोद में उठा लिया
और रोने का कारण पूछा
अब तो कान्हा बोल पड़े
बाबा रोने का कारण बाद में पूछना
पहले ये बतलाओ
ये सब यहाँ क्या होता है
तब नंद बाबा ने बतलाया
ये जय- जय के लिए भोग बनाया है
सुन कान्हा बोल पड़े
इसी जय- जय ने तो 
आज पिटवाया है
कौन है ये जय -जय बाबा
हमारे लिए क्या करता है
सुन नन्द बाबा ने बतलाया
इन्द्र देवता की 
हम सब पूजा करते हैं
फिर वो पूजा से खुश होकर
पानी बरसाता है
जिससे हमारा प्रदेश
धन-धान्य से 
परिपूर्ण हो जाता है
ये सुन कान्हा बोल उठे
क्यों जान- बूझकर
कुराह पर सब चलते हैं
संसार में धर्म और कर्म
तीन तरह के होते हैं
एक वेद व् शास्त्रानुसार
दूजा लोक व्यवहार
और तीसरा अपने मन से 
कार्य करना 
सो वेदानुसार कार्य करने से ही
शुभ फल मिला करता है
फिर भला इंद्र की 
पूजा से क्या मिलेगा
ना वो किसी को
भक्ति, मुक्ति या वरदान 
दे सकता है
वो तो खुद सौ यज्ञ 
करने पर इन्द्रासन पाता है
तभी सभी देवता उसे 
अपना राजा मानते हैं
जो दैत्यों से लडाई  में
खुद जा छिप जाता है
और नारायण की सहायता से
पुनः इन्द्रासन पाता है
ऐसे निर्बल की क्यों 
तुम सब पूजा करते हो
धर्मानुसार परमेश्वर की
पूजा क्यों नहीं करते हो
जो अज्ञानी नारायण को छोड़
दूसरे देवों को पूजा करते हैं
उन्हें मूर्ख समझना चाहिए
जब प्रभु इच्छा बिना
पत्ता तक नहीं हिल सकता
फिर कोई किसी को
सुख- दुःख भला क्या देगा
जो होता है परमेश्वर की
इच्छानुसार होता है
जो कर्म में लिखा गया
वो तिल भर भी
ना घटता - बढ़ता है
सुख- संपत्ति घर- परिवार
वस्तुएं सब धर्म -कर्म से मिलती हैं
फिर बताओ इसमें
इंद्र ने क्या नया किया
उसे तो सिंचाई मंत्री 
है बनाया गया
उसका कार्य है वर्षा करना
गर इसमें वो कोताही बरतेगा
नारायण के कोप का भाजन होगा
अपने वर्णानुसार धर्म को ना छोडो
खेती व्यापार गौ सेवा करना ही
वैश्य का धर्म होता
और हमें सारी सुख समृद्धि 
ये गोवर्धन पर्वत ही देता
इससे  ही हमारा गौ धन
फलता -फूलता 
गौ बछड़े यहीं चरा करते
फिर भर -भर कर 
दूध -घी दिया करते
जिससे सबका जीवन चलता
क्यों ना हम सभी
इसी पर्वत की पूजा करें
ये सुन ग्रामवासी खुश हुए
और नंदबाबा से बोल पड़े
नंदबाबा बेशक बालक है छोटा
पर बात पते की है कहता


सबने कहा कन्हैया
ये तो बतलाओ
गर इन्द्र नाराज हुआ
तो क्या तुम्हारा गोवर्धन
हमारी रक्षा करेगा
सुन कान्हा ने हामी भरी
एक ग्वाल ने कहा
तुम्हारे गोवर्धन की
पूजा को हैं हम तैयार
मगर उसे सामने आकर
भोग लगाना होगा
कान्हा ने वो भी है
स्वीकार किया
तीसरी बात ग्वाल बालों ने ये कही
तुम्हारे गोवर्धन को क्या भाता है
५६ प्रकार का भोजन
हमारा गोवर्धन करता है
कान्हा ने बतलाया
और ५६ प्रकार के 
भोजन का अर्थ
गुनीजनों ने है ये बतलाया
पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (5)
पांच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन (6)
पांच और छः होते हैं ग्यारह 
इस तरह मिलाकर हो गया 
५६ प्रकार का भोजन
जहाँ मन ,वचन और कर्म से 
प्रभु को पूर्ण समर्पण किया
जीव का वो ही प्रभु को
५६ प्रकार का भोजन हुआ
सर्वस्व समर्पण का भाव ही
प्रभु ने  है बतलाया
पर इतनी सी बात ही
जीव ना कभी समझ पाया
अब ग्वालों ने कहा
देखो कान्हा 
पहली बार पूजा करेंगे
कोई त्रुटि हुई तो
तुम्हारे देव हमें क्षमा करेंगे
कान्हा ने कहा
तुम्हारी ये बात 
नहीं मानी जा सकती
पूजा तो शास्त्र सम्मत करनी होगी
सुन गोप बोले वो तो
हमें नहीं है आती
तब कान्हा ने बतलाया
जैसे- जैसे कहता जाऊँ
तुम वैसा करते जाना
सुन सबके मन हर्षाये
और सामग्री गाडी बैलों पर 
लदवा दिया
उत्तम वस्त्राभूषण पहन
सबने गोवर्धन को 
प्रस्थान किया
सबने मिल सबसे पहले
गोवर्धन को स्नान कराया
पर इतने बड़े पहाड़ पर ना
कोई असर हुआ
जब तक पानी भर कर लाते थे
तब तक गोवर्धन सूख जाते थे
सुबह से शाम हुई
पर गोवर्धन पर्वत की तो
मूंछ भी ना गीली हुई
ग्रामवासी थक हार गए
कान्हा से गुहार लगायी
देख भैया हम से तो अब
और पानी ढोया जाता नहीं
और तेरे गोवर्धन पर तो
कुछ भी असर होता नहीं
सुन कान्हा बोले अगर
पानी का इंतजार पास हो जाये
तो बोलो कुछ समस्या रहेगी
सुन ग्रामवासी प्रसन्न हुए
सबको आँख बंद करवाई
और मन से ही मनहरण प्यारे ने
मानसी गंगा उपजाई
अब सबने मिल गोवर्धन को
स्नान कराया
शास्त्र सम्मत विधि से पूजा किया
जैसे ही भोग लगाने को उद्यत हुए
ये देख गिरिराज स्वयं प्रकट हुए
ब्रजवासी ये देख अति आनंदित हुए
गिरिराज कोई और नहीं
स्वयं कान्हा ने ही 
रूप बनाया था
और अति हर्षित हो
ब्रजवासियों के भोजन का
भोग लगाया था
मांग -मांग कर खाते थे
विविध पकवानों का
स्वाद उठते थे
ब्रजवासियों को अपनी
गलती का अहसास हुआ
व्यर्थ ही इतने साल
इन्द्र का पूजन किया
जिसने ना कभी दर्शन दिया
गिरिराज का आज ही
पूजन किया
उसने तो स्वयं प्रकट हो
भोजन किया
ये बात सबके मन को भा गयी
अति हर्षित हो सभी
गिरिराज का पूजन कर
ब्रज में लौट आये



क्रमश: ……………


Wednesday, June 27, 2012

कृष्ण लीला ………भाग 54




इक दिन कान्हा ग्वाल बालों संग
वन में विचरण करते थे
भांति भांति के खेल 
खेला करते थे
जब सब मिल कलेवा करने लगे
तब भोजन कम पड़ गया
किसी की ना क्षुधा शांत हुई
कान्हा से सब कहने लगे
आज तो भूख मिटी नहीं
कोई उपाय करना होगा
ये सुन अंतर्यामी ने विचार किया
पास के वन में मथुरावासी 
ब्राह्मण स्त्रियाँ मेरी
दर्शनाभिलाषी हैं
आज उनका मनोरथ 
सुफल करना होगा
ये सोच  प्रभु ने
ग्वाल बालों को
ब्राह्मणों के पास भेज दिया
अज्ञानता और कर्म के अभिमान में
आकंठ डूबे ब्राह्मणों ने
ना श्याम बलराम की महिमा जानी
जब तक हवन पूजन ना पूरा होगा
किसी को कुछ ना मिलेगा
ये देवताओं के नाम 
यज्ञ हम करते हैं
यज्ञ पूर्ण होने पर ही
सबको प्रसाद मिलेगा
उन  ब्राह्मणों ने कान्हा को
साधारण बालक ही जाना
जिसके नाम का हवन करते थे
उसी आदिशक्ति को ना पहचाना
कोरे ज्ञान की महिमा गाते थे
असलियत को ना पहचान पाते थे
उदास हो ग्वालबालों ने
सारा किस्सा बतलाया है
सुन प्रभु ने उन्हें
दूजा उपाय बतलाया है 
अब की बार तुम सब 
उनकी पत्नियों के पास जाना
जाकर उनसे भिक्षा माँग लाना
वे बड़ा आदर सत्कार करेंगी
जो तुम चाहोगे वे सब देंगी
जब ग्वाल बालों ने जाकर
कृष्ण इच्छा बतलाई
सुन ब्राह्मण पत्नियाँ हर्षायीं
मनसा वाचा कर्मना 
केशव मूर्ति के दर्शन की
वो इच्छा रखती थीं
सोने चांदी के थालों में
हर्षित हो बड़े प्रेम से
मेवा , मिठाई, पकवान , पूरी
कचौरी, दूध , दही , मक्खन रख
ग्वाल बालों संग
केशव मूर्ति के दर्शन को चलीं
पतियों का कहा भी  ना माना
आज तो प्रेम था परवान चढ़ा 



इक ब्राह्मणी को उसके पति ने
बरजोरी घर में बंद किया
उसने उसी क्षण अपना
पंचभौतिक शरीर छोड़ दिया
और सबसे पहले पहुंच 
प्रभु के चरणों में
खुद को समर्पित किया
प्रभु की दिव्य ज्योति में 
स्वयं को लीन किया
इधर अन्य स्त्रियाँ जब पहुंची थीं
प्रभु की शोभा निरख
अति हर्षित हुई थीं 
साँवली सूरतिया
पीताम्बर ओढ़े
एक हाथ में कमल लिए
गले में वनमाला और
मस्तक पर मयूरपंख
प्रभु के स्पर्श से 
शोभायमान होते थे
जिन्हें देख ब्राह्मणियों के
नयन पुलकित होते थे
नयन कटोरों से 
रसपान करती थीं
प्रभु की छवि को 
नेत्र मार्ग से भीतर ले जा
आलिंगन करती थीं
और ह्रदय ज्वाल शांत करती थीं
जब प्रभु ने जाना
ये सब छोड़ मेरे पास आई हैं
सिर्फ मेरे दरस की 
लालसा ही इनमे समायी है
तब प्रभु ने उनका स्वागत किया
और उनके प्रेम को स्वीकार किया
अब तुम मेरा दर्शन कर चुकीं
तुम्हारा आतिथ्य भी हमने स्वीकार किया
मगर अब बहुत विलम्ब हुआ
तुम्हारे पति यज्ञ करते हैं
तुम्हारे बिना ना
यज्ञ सम्पूर्ण होगा
जाओ अब तुम प्रस्थान करो
सुन ब्राह्मण पत्नियों ने कहा
प्रभु आपकी ये बात निष्ठुर है
श्रुतियां भी यही गाती हैं
जिसने संपूर्ण समर्पण किया
जीवन अभिलाषा का त्याग किया
उसे ना फिर संसार में लौटना पड़ा
अपने प्रियजनों की आज्ञा का 
उल्लंघन कर तुम्हारे पास आई हैं
अब ना हमारे पिता , पुत्र, भाई
पति,बंधु- बांधव
ना कोई हमें स्वीकार करेंगे
अब आपके चरण कमलों के सिवा
ना कोई ठिकाना पाती हैं
इतना सुन मोहन बोल पड़े
अब ना तुम्हारा कोई 
तिरस्कार करेगा
उनकी तो बात ही क्या
सारा संसार तुम्हारा सम्मान करेगा
क्योंकि अब तुम मेरी बन गयी हो
मुझसे युक्त हो गयी हो
जो मेरा बन जाता है
फिर वो सबके मन को भाता है
उसे मेरा ही स्वरुप मिल जाता है
इसलिए हर मन में उसे देख
आनंद समाता है 
अब तुम जाओ 
मन मेरे को तुमने दे दिया है
पर गृहस्थ धर्म का भी तो 
निर्वाह करना होगा
और अपने पतियों में ही
मेरा दिग्दर्शन करना होगा
हे प्रभु एक स्त्री यहाँ आती थी
पर उसके पति ने रोक लिया
ना जाने उसका क्या हुआ
ये सुन प्रभु ने उसका
चतुर्भुजी रूप दिखला दिया
जब ब्राह्मण पत्नियाँ वापस आई हैं
जिनके मुखकमल पर 
दिव्य आभा जगमगाई है
जिसे देख ब्राह्मणों को
बुद्धि आई है
अब अपनी अज्ञानता का
उन्हें भान हुआ
जिस प्रभु के दर्शन 
ध्यानादिक  में भी 
नहीं मिलते हैं'
वो आज स्वयं यहाँ पधारे थे
हमारे जन्मों के पुण्यों को
सुकृत करने आये थे
हाय ! हमने ना उन्हें पहचाना
हमारे पत्थर ह्रदयों में 
ना दया का भान हुआ
अभिमान के वृक्ष ने
कैसा बुद्धि को भ्रमित किया
हमारे जीवन को धिक्कार है
सिर धुन - धुन कर पछताते हैं
निज पत्नियों को बारम्बार
शीश नवाते हैं
उनके प्रेम के आगे
नतमस्तक हुए जाते हैं
और प्रभु से क्षमा का दान
मांगे जाते हैं
जब पश्चाताप की अग्नि से
ब्राह्मणों का ह्रदय निर्मल हुआ
तब प्रभु ने उनका 
सब अपराध क्षमा किया
जिसने अपनी पत्नी को रोका था
जब घर में जाकर देखा
उसके मृत शरीर को पाया
ये देख सिर धुन- धुन कर 
वो पछताया
तब ब्राह्मण पत्नियों ने उसे
सारा हाल बतलाया
दौड़ा -दौड़ा प्रभु चरणों में वो आया
अपने अपराध पर बहुत पछताया
तब उसकी स्त्री की भक्ति के प्रभाव से
प्रभु ने उसे भी चतुर्भुज बनाया
और निज धाम में 
दोनों को भिजवाया
अब प्रभु ने ग्वालबालों संग
भोजन का आनंद लिया
मुरली बजा गायों को 
समीप बुला लिया
और वृन्दावन को प्रस्थान किया


क्रमश: ……………