Thursday, October 4, 2012

पूर्णविराम से पहले !!!!!!!!

अर्धविराम की अवस्था हो
मगर राह ना सूझती हो
वर्णसंकर सी पगडण्डी हो
मगर राही ना कोई दिखता हो
अन्जान द्वीपों सी भटकन हो
मगर रूह ना कोई मिलती हो
एक आखिरी दांव खेला हो
और पासा भी उल्टा ही पड़ा हो
बताओ तो ज़रा फिर
चौसर के खेल में
कब शकुनी कोई जीता है और धर्मराज कोई हारा है ...........पूर्णविराम से पहले !!!!!!!!

अब इसको कहूँ गज़ल या दिल के उदगार


अब इसको कहूँ गज़ल या दिल के उदगार
कान्हा कान्हा रट रही सांसो की हर तार

मुरली वारो सांवरो बैठो मन के द्वार
मै बैरन बैठी रही करके बंद किवार

श्रद्धा पूजा अर्चना सब भावों के विस्तार
पूर्ण होते एक मे जो मिल जाते सरकार

एक बूँद एक घट एक ही आकार प्रकार
दृष्टि बदलने पर ही व्यापता ये संसार

मधुर मिलन की आस पर जीवन गयो गुज़र
कब आवेंगे श्यामधनी मिटे ना मन की पीर

श्याम रंग की झांई परे श्यामल तन मन होय
मेरी मन की भांवरों मे श्याम श्याम ही होय



सत्य था , है , रहेगा

मैं राख का अंतिम श्वास बन जाती .......जो तुम होते
मैं मुखाग्नि का अंतिम कर्म बन जाती .......जो तुम होते
मैं कच्चे घड़े संग चेनाब पार कर जाती .......जो तुम होते
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


जो तुम होते ........एक श्वास धरोहर बन जाती
जो तुम होते ........एक कर्म की मुक्ति हो जाती
जो तुम होते ........एक मोहब्बत परवान चढ़ जाती
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम


हो सकता ऐसा मुमकिन .........गर हम होते
ऋतु बसंत  भी मदमाती .........गर हम होते
एक दीपशिखा जल जाती ........गर हम होते
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


अश्रुबिंदु ना कभी ढलकाते ...........जो प्रियतम होते
विरह अगन ना कभी सताती ........जो प्रियतम होते
इश्क की ना दास्ताँ बन पाती ........जो प्रियतम होते
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


ना तुम होते ना हम होते ........ये सृष्टि किस पर मदमाती
ना तुम होते ना हम होते .......ये प्यास अधूरी रह जाती
ना तुम होते ना हम होते .......तो प्रेम में अपूर्णता रह जाती
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


अच्छा हुआ जो ना मिले कभी .........खोजत्व पूर्ण हो जाता
अच्छा हुआ जो ना मिले कभी .........निजत्व पूर्ण हो जाता
अच्छा हुआ जो ना मिले कभी .........शिवत्व पूर्ण हो जाता
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम


अधूरी प्यास, अधूरा तर्पण , अधूरा जीवन .........जरूरी था
जीवन की इकाइयों दहाइयों में अधूरापन ..........जरूरी था
प्रेम का अपूर्ण ज्ञान , अपूर्ण आधार .............जरूरी था
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


अपूर्णता में सम्पूर्णता का आधार ही तो 

व्याकुलता को पोषित करता है .......सत्य था , है , रहेगा
जन्म जन्म की प्यास का अधूरापन ही तो 

घूँट भरने को लालायित करता है .......सत्य था , है , रहेगा
मिलन पर विरह का स्वाद ही तो 

ह्रदय रुपी जिह्वा को आनंदित करता है...........सत्य था , है , रहेगा
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

एकोअहम

एकोअहम
अन्यो नास्ति का भाव
कैसे क्रियान्वित हो
कैसे दृष्टि पलटे
जो सृष्टि का बोध विस्मित हो
नज़रों का धोखा
कैसे मान सकता है आम इंसान
जो सामने दिख रहा है
घटित हो रहा है
क्रियान्वित है
कैसे उसे ना स्वीकारे
और जो नहीं है
उसे स्वीकार ले
आखिर कैसे ?
एक ऐसा प्रश्न है
जिसके चक्रव्यूह में
उलझा सारा संसार है
जो कहलाता असार है
मगर प्रश्न अपनी जगह
अब भी उपस्थित है
आखिर कैसे
सारा दृष्टि विलास महसूस हो
आखिर कैसे कोई खुद से अलग हो
बेशक पथ कोई हो
चाहे कर्म हो या योग या भक्ति
मगर आम इंसान में कहाँ है वो शक्ति
जो ढूँढ निकाले स्व का महत्त्व
बेशक खोजकर्ता खोज ही लेते हैं
अणु भी परमाणु भी
मगर अस्तित्व की खोज में
खुद से खुद को अलग करना
और फिर खुद में ही सब समाहित करना
आसान प्रक्रिया तो नहीं है
एकोअहम के भाव का परिलक्षित होना
और हो जाये तो फिर
उसका हर पल बने रहना
खुद को संसार से निर्लेप कर लेना
कहना जितना आसान दिखता है
क्रियान्वित करना उतना ही कठिन दिखता है
क्योंकि प्रयोगों की दिशाओं में
खोजें तो बहुत की जाती हैं
मगर प्रमाणिकता के साथ
क्रियान्वित कराने के लिए
मजबूत ठोस धरातल हर किसी को नहीं मिलता
तो क्या ऐसा ही है हम सबके साथ
गर निकले हों खोज पर
एकोअहम के भाव को पा लिया हो
और उसके बाद
उस ठोस धरातल की जरूरत आ पड़ी हो
तो कैसे एकोअहम का भाव पुष्ट हो सकता है
क्योंकि
ज्ञानमार्ग में धरातल बेहद चिकना होता है
ज़रा सी फिसलन ही पर्याप्त होती है
फिर उसी गड्ढे में धकेलने के लिए
ऐसे में
एकोअहम के भाव को कोई कब तक संजो सकता है
सुना है
प्रभु को ज्ञानी तो बहुत पसंद हैं
मगर अहंकारी नहीं
और एकोअहम के भाव में
कहीं ना कहीं अहम् का समावेश तो हो ही जाता है
क्या इसीलिए ज्ञानमार्गी फिसल जाता है
ना जाने कैसी ये सूक्ष्म जगत की फिलोसफी है
जिसमे मन उलझ उलझ जाता है
मगर पार ना कोई पाता है

Tuesday, October 2, 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी ……भाग 70

अब प्रभु ने जितनी गोपियाँ
उतने रूप धरे थे
दो- दो गोपियों के बीच कन्हैया
गलबहियां डाले नाचते थे
कभी एक गोपी के चारों तरफ
कृष्ण नृत्य करते थे
रसमयी दिव्य लीला का
प्रभु ने प्रारंभ किया
सहस्त्रों गोपियाँ सहस्त्रों कृष्ण
चारों तरफ नृत्य करते थे
जिसे देखने देवता भी
पत्नियों सहित
आकाश में उतरे थे
स्वर्ग की दुन्दुभियाँ स्वयं बज उठीं
दिव्य पुष्प वर्षा होने लगी
गन्धर्व गण प्रभु का यश गान करने लगे
गोपियों के कंगन
पैरों की पायल और करधनी के घुँघरू
एक साथ बजने लगे
ताल से ताल मिलाने लगे
सुर लय ताल ना बिगडती थी
गोपियाँ चाहे रूकती थीं
चाहे थकती थीं , चाहे गिरती थीं
पर लय ताल पर ना असर होता था
अजब चमत्कारिक रसमयी
अद्भुत वातावरण बना था
कृष्ण गोपियों  संग कभी
बड़े वेग से घूमते थे
कभी गोपियाँ कलापूर्ण ढंग से मुस्काती थीं
भौहें मटकाती थीं
नाचते- नाचते पतली कमर
ऐसे लचक -लचक जाती थी
मानो टूट गयी हो
नाचते -नाचते पसीने की बूँदें
चेहरे पर छलछला रही थीं
उन पर काले केश यूँ लगते मानो
काले सर्प ओस की बूँद चाटने आये हों
तन -मन वस्त्रों की सुधि
गोपियाँ भूल गयीं
चोटियाँ ढीली पड़ गयीं
नीवों की गाँठें खुल गयीं
सिर्फ और सिर्फ
आनंद विलास छा गया
कोई गोपी थक जाती तो कृष्ण को पकड़ लेती
तो किसी गोपी का चन्दन
कृष्ण के अंग से लग जाता
और सारा वातावरण महका जाता
कोई गोपी कहती
ज़रा मेरे कलेजे पर
हाथ रख देखो सांवरे
कैसा धड़कता है
आठों पहर तुम इसमें रहते हो
डरती हूँ कहीं
कलेजा धड़कने से तुम्हें दुःख ना पहुंचे
ये उनके प्रेम की पराकाष्ठा थी
बस में होता तो धडकनों को भी रोक देतीं
पर अपने प्रियतम को
ना ज़रा सा भी क्लेश होने देतीं
जब प्रेम की ऐसी उच्चावस्था हो
वहाँ कैसे ना प्रभु की
अनंत कृपा हो
कैसे ना प्रभु उनके वश में हों
यूँ मोहन ने ब्रजबालाओं संग
छह राग और छत्तीस रागनियों संग
रास विलास किया
किसी को ना तन- मन की सुधि रही
नाचते- नाचते गोपियों का आँचल उड़ जाता था
कभी मोहन का मुकुट गिर जाता था
कभी मोतियों  की माला
टूट कर बिखर जाती थी
पर किसी को  किसी की
सुधि कहाँ रह  जाती थी
सब को यूँ लगता
मोहन मेरे साथ ही रास करते हैं
कोई गोपी मोहन के सुर में
ऐसे राग अलापती थी
कि मोहन वंशी बजाना भूल जाते थे
और उसके राग में खो जाते थे
जैसे निर्विकार शिशु दर्पण में
अपनी परछाईं से खेला करता है
वैसे ही राधारमण कभी उन्हें
ह्रदय से लगाते थे
कभी प्रेमभरी चितवन से
घायल करते थे
कभी उन्मुक्त हँसी हँसते थे
कभी अंग स्पर्श करते थे
प्रभु के संस्पर्श से
गोपियाँ प्रेमानंद में भाव विह्वल हुईं
केश खुल गए
हार टूट गए
गहने वस्त्र अस्त व्यस्त हो गए
ये देख देवता भी चकित हो गए
यूँ तो प्रभु आत्माराम हैं
उनमे ना किसी क्रिया का लेशमात्र है
अपने अतिरिक्त किसी और की आवश्यकता नहीं
फिर भी उन्होंने
जितनी गोपियाँ उतने रूप धरे थे
राग रंग के मद में गोपियाँ
गहने और वस्त्र एक दूजे पर
वारना करती हैं
ऐसे अद्भुत दृश्य को देख
यमुना का जल ठहर गया
पशु पक्षी मोहित हो
चित्रलिखे से खड़े रह गए
हवा बहना भूल गयी
जब राधा संग मोहन नृत्य करते हैं
जिसे देख- देख गोपांगनाओं  के ह्रदय
हर्षित होते हैं
तभी एक गोपी नन्द
और एक वृषभानु बनी
और कान्हा का राधा संग
गठजोड़ कर ब्याह करा
समधियों का शिष्टाचार कराया
और राधा के हाथ में
कंगना बांध मोहन से खुलवाती हैं
और जब मोहन खोल ना पाते हैं
तो मीठी ठिठोलियाँ करती हैं
फिर सब गोपियाँ दोनो का पूजन करती हैं
इस दिव्य महारास के दर्शन कर
देवता मोहित होते हैं
और गोपियों की ब्रज रज की
वहाँ के जड़ -चेतन के
भाग्य की सराहना करते हैं
क्यों ना हमें ब्रज में जन्म मिला
ये सोच कर अकुलाते हैं
जब गोपियाँ प्रभु संग विलास कर थक गयीं
तब प्रभु ने यमुना में
गोपियों संग प्रवेश किया
जैसे गजराज हथनियों संग
जल क्रीडा करता है
एक दूजे पर जल की बौछार करते हैं
देवता पुष्प वर्षा करते स्तुति करते  हैं
अद्भुत दृश्य को निहारा करते हैं
जब सबके अन्तस्थ शीतल हुए
तब प्रभु जल से बाहर निकले
और यमुना तट पर आये
योगमाया ने सबको वस्त्र
आभूषण इत्र गजरे दिए
सबने पुराने वस्त्र वहीँ छोड़ दिए
जिन्हें देवताओं ने प्रसाद रूप
टुकड़े कर आपस में बाँट लिया
वास्तव में ये तो प्रभु के
चिन्मय स्वरुप की चिन्मयी लीला थी
कामभावना हो या क्रिया या चेष्टा
सब उनके ही आधीन थी
जिसमे कोई दूसरा स्वरुप ना था
सिर्फ स्वरुप ही निज स्वरुप में अवस्थित था
मगर परीक्षित के मन में प्रश्न उठा
जब प्रभु ने धर्म की रक्षा को अवतार लिया
तो क्यों परस्त्रियों का स्पर्श किया
जब प्रभु पूर्णकाम थे
तो किस अभिप्राय से ऐसा कर्म किया
शुकदेव ने जिसका इस प्रकार उत्तर दिया
समरथ को नहीं दोष गोसाईं
ज्यों पावक चाहे अच्छा हो या बुरा
सब ग्रहण कर लेती है
पर उस पर ना दोष लगता है
जैसे भोलेनाथ  ने
हलाहल का पान किया
मगर उनका उससे कुछ ना बिगड़ा क्योंकि
सामर्थ्यवान का कर्म
निज उद्देश्य से नहीं होता
जगत के कल्याण के लिए
उनका सब कर्म है होता
अहंकार रहित ऐसे पुरुष
ना किसी कर्म बँधन में फंसते हैं
उनके तो हर कर्म जगत हित में होते हैं
फिर चाहे कर्म शुद्ध हों या अशुद्ध
मगर ऐसा ही कर्म यदि
असामर्थ्य विहीन करे
तो अपनी दुर्दशा को स्वयं पहुंचे
जो आचरण अनुकरणीय हो
वो ही जीवन में उतारा जाता है
मगर अन्य मनुष्यों द्वारा
हर कार्य किसी ना किसी
उद्देश्य के निहित किया जाता है
जो स्वार्थ और अनर्थ से जुड़ा होता है
मगर देवता आदि इनसे
ऊपर उठ जाते हैं
तभी ऐसे कर्म कर पाते हैं
तो सोचो जब ये ऐसा कर पाते हैं
तो इनको बनाने वाला
वो जग नियंता
कैसे उसे मानवीय गुणों
शुभ अशुभ
से जोड़ा जा सकता है
कैसे उनमे कर्म बँधन की
कल्पना की जा सकती है
जिनकी चरण रज का
भक्त सेवन करते हैं
जिनके प्रभाव से योगीजन
कर्म बंधन काट डालते हैं
वे प्रभु भक्तों की इच्छा पर ही
अपना चिन्मय स्वरुप प्रकट करते हैं
जब वो ही प्रभु
आत्मरूप से
चर -अचर समस्त विश्व में व्याप्त हैं
फिर वो गोपियों , उनके पतियों
गाय, बछड़ों , बच्चों से
कहो कैसे जुदा हैं
ये तो जीवों पर परम कृपा
बरसाने को प्रभु
ऐसी लीला करते हैं
जिन्हें सुन जीव भगवद परायण हो जायें
उसका चित प्रभु में ही विलय हो जाये
इसलिए प्रभु की इस लीला को
ना दोष दृष्टि से देखो
ये तो जीव और ब्रह्म का
आत्मसाक्षात्कार है
जो जन्म जन्मान्तरों से बिछड़ा है
और महारास में जाकर
अपनी ज्योति में जा मिला है
यही तो जीवन और जीव की परमगति है '
जिसे पाने को जीव
लख चौरासी में भटकता है
इस प्रकार प्रभु ने महारास का आनंद दे
गोपियों की विदा किया
मगर उनके चित को
अपने श्री चरणों में रख लिया
अब गोपियाँ रहती तो घर में थीं
सारे गृह कार्य भी करती थीं
मगर उनकी दृष्टि
उनका मन
उनकी हर क्रिया
सिर्फ कृष्ण के लिए ही होती थी
सबमे कृष्ण का ही दर्शन करती थीं
भेदबुद्धि मिट चुकी थी
एक पर ही अब टिक चुकी थी
बस यही तो महारास का महाभाव है
जहाँ दो का भाव मिट जाता है
और जीव पूर्णता पा जाता है
परीक्षित ये हाल उनके घर में
किसी ने ना जाना
ये ही तो प्रभु की दिव्य लीला होती है
जो अन्दर ही घटित होती है
बाहर से तो हर क्रिया यथावत होती है
मगर अंतर में सब भेद मिट जाता है
जीव ब्रह्म का मिलन हो
अंतस में महारास हो जाता है
इसे पाने को ही हर जीव भटका करता है
और यही उसके जीवन का
प्रथम और अंतिम लक्ष्य होता है
गोपियाँ कोई देह नहीं
बल्कि एक भाव हैं
जिसमे जीव जब "मैं" को भुला देता है
तभी निज स्वरुप को पा लेता है
यह रास वस्तुतः परम उज्जवल रस का दिव्य प्रकाश है
जिन सुधीजनों में गोपीभाव पुष्ट होता है
उन्हें ही इस दिव्य महारास का अनुभव होता है
आत्मा का आत्म में विलास ही
महारास कहलाता है
जब साधक का ध्यान टिक जाता है
ना केवल जड़ शरीर बल्कि
सूक्ष्म शरीर को प्राप्त होने वाले
स्वर्ग , कैवल्य या मोक्ष का भी त्याग होजाता है
और दृष्टि में केवल
चिदानंद स्वरुप कृष्ण बस जाता है
उनके ह्रदय में ही
कृष्ण को तृप्त करने वाला
प्रेमामृत बरसता है
उनकी इस अलौकिक स्थिति में
स्थूल शरीर और उसकी क्रियाओं का
लेश भी ना बचता  है
ऐसी कल्पना तो देहात्मबुद्धि से
जकड़े जीवों को ही होती है
जिन्होंने गोपियों को जाना
या गोपीभाव  को पहचाना
उन्होंने फिर सिर्फ वैसी ही अभिलाषा की
फिर वो चाहे ब्रह्मा हो या शंकर
उद्धव हो या अर्जुन
सब की रति प्रभु चरणों में हुई

क्रमश:…………..........



Sunday, September 30, 2012

मेरे घर श्याम आ गये

सुना है जब किसी संत का घर मे आगमन होता है तो बस वो ही क्षण पावन होता है और इस कलिकाल मे वो संतों के रूप मे ही पधारते हैं।बस आनन्दविभोर करने वाले क्षण थे ।सात दिन कहाँ और कैसे गुजरे पता ही नही चला ।शायद यही ईश्वर की असीम अनुकम्पा होती है ।(23 सितम्बर - 30 सितम्बर श्री मद भागवत सप्ताह )  और जब महाराज श्री का आगमन हुआ तो बस यूँ लगा जैसे वो कन्हैया ही इस रूप मे आ गया है फिर भावों का उदय तो होना ही था इस रूप मे …………


मेरे घर श्याम आ गये
मेरे घनश्याम आ गये
अपनी मोहिनी छटा बिखरा गये
मेरे घर श्याम आ गये

श्याम जब आये संग सखियाँ भी लाये

मेरे बृजमंडल मे आनन्द छाये
चहुँ ओर मंगल ध्वनि बिखराये
सबके साथ रास रचा गये
मेरे घर श्याम आ गये

विदुरानी सम भोग लगाये

शाक रज - रज कर खाये
मुरली भी मधुर सुनायें
प्रेम की हर रीत निभा गये
मेरे घर श्याम आ गये

बतियाँ कैसी मधुर बनायें

पल मे हँसायें पल मे बहलायें
सबको अपना दीवाना बनायें
हाथ पकड मधुबन मे नचा गये
मेरे घर श्याम आ गये………

Wednesday, September 26, 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी………भाग 69


जब विरह की उच्चतम अवस्था हुई
और प्रभु ने देखा
अब ये बस मेरी हुईं
तभी प्रभु ने खुद को प्रकट किया
यहाँ एक कारण नज़र आता है
प्रभु के अंतर्धान होने का
वो बतलाना चाहते हैं
जो गोपियाँ  दिन रात
मेरे नाम की माला जपती थीं
जिनका मेरे सिवा ना दूजा ठिकाना था
उनकी परीक्षा लेने से भी ना चूकता हूँ
जिन्होंने सर्वस्व  समर्पण किया था
उनको भी किसी भी मोड़ पर
परीक्षा में बैठा देता हूँ
तो जीव जो उनकी तरफ आते हैं
और अपने प्रेम का दावा करते हैं
तो उन्हें कैसे छोड़ सकता हूँ
प्रभु देखना चाहते हैं
ये कच्चा है या पक्का
क्या इसका भाव वास्तव में
प्रेम समर्पण का है
या अभी भी दुनियावी
बातों से भरा है
जब प्रभु ठोक बजाकर परख लेते हैं
तब उसे रास में शामिल कर लेते हैं
और उसका योगक्षेम स्वयं वहन कर लेते हैं

जब प्रभु ने जान लिया
अब ये प्राण छोड़ देंगी
पर विरह में ना जीवित रहेंगी
तब प्रभु ने उनकी अलौकिक प्रीति जान
स्वयं को प्रकट किया
खिले कमल सा प्रभु का मुखकमल
वैजयंती माला पहने
मंद मंद मुस्कुराते
मुरली मधुर बजाते
प्रभु का जब दर्शन किया
गोपियों में प्राणों का संचार हुआ
ज्यों रेत पर पड़ी मीन पर
बरखा ने जीवनदान दिया
सब गोपियों के ह्रदय आंगन  खिल उठे
कान्हा को सबने घेर लिया
किसी गोपी ने उनका हाथ पकड़ लिया
किसी ने उनका चरण स्पर्श किया
किसी ने उन्हें नेत्र द्वार से
ह्रदय में बिठा लिया
और नेत्र बंद कर
अन्दर ही अन्दर उनका
आलिंगन कर
प्रेम समाधि में डूब गयी
कोई गोपी अपने कटाक्ष बाणों से
बींधने लगी
कोई गोपी प्रेम गुहार करने लगी
तो कोई गोपी निर्मिमेष नेत्रों से
प्रभु के मुखकमल का
मकरंद रस पान करने लगी
फिर भी ना ह्रदय तृप्त होता है
सभी गोपियों ने प्रभु में ध्यान लगाया है
जिसे देख उनका ह्रदय हर्षाया है
प्रभु विरह की वेदना से
जो दुःख उपजा था
वो अब दूर हुआ था
परम शांति का गोपियों को
अनुभव हुआ था
प्रभु के दर्शन से
गोपियाँ पूर्णकाम हुईं
इतना आनंदोल्लास हुआ
ह्रदय की सारी आधि व्याधि मिट गयी
अब गोपियों ने चन्दन केसर युक्त
अपनी ओढनी बिछा
प्रभु को विराजमान किया
जिन प्रभु को योगसाधन से भी
पवित्र ह्रदय में
ऋषि मुनि ना
ह्रदय सिंहासन पर बैठा पाते हैं
वो कृष्ण आज प्रेम के वशीभूत हो
यमुना की रेती में
गोपियों की ओढनी पर बैठे दिखाई देते हैं
ये ही तो प्रेम की सगाई है
जो सिर्फ गोपियों ने ही निभाई है
प्रभु के संसर्ग का , संस्पर्श का
गोपियाँ आनंद लेती हैं
और कभी कभी कह उठती हैं
कितना सुकुमार है
कितना मधुर है
और मन ही मन
प्रभु के छिपने से नाराज होने का
अभिनय कर उन्हें
दोष स्वीकारने को कहती हैं
गोपियों ने यहाँ प्रभु से प्रश्न किया
हे नटवर ज़रा इतना तो बतलाना
कुछ लोग ऐसे होते हैं
जो प्रेम करने वालों से ही प्रेम करते हैं
और कुछ लोग
प्रेम ना करने वालों से भी प्रेम करते हैं
परन्तु कोई कोई तो
दोनों से ही प्रेम नहीं करते हैं
प्यारे ज़रा बतलाओ
इन तीनों में से तुम्हें
कौन अच्छा लगता है ?
तब प्रभु ने जवाब यूँ दिया
गोपियों जो प्रेम करने पर प्रेम करे
ये तो सिर्फ स्वार्थियों का व्यापार हुआ
इसमें ना कोई सौहार्द हुआ
और ना ही धर्माचरण का पालन हुआ
जो लोग ना करने वालों से भी प्रेम करते हैं
वहाँ ही निश्छल सत्य और पूर्ण धर्म का पालन हुआ
जैसे सज्जन, माता पिता , करुणाशील लोग
बिना कारण दया करते हैं
और सबके परम हितैषी होते हैं
कुछ ऐसे होते हैं
जो प्रेम करने वालों से भी
प्रेम नहीं करते
और प्रेम ना करने वालों का तो वहाँ
प्रश्न ही नहीं उठता है
ऐसे लोग भी चार प्रकार के होते हैं
एक जो निज स्वरुप में मस्त रहते हैं
जहाँ द्वैत का ना भास होता है
दूसरे वे जिन्हें द्वैत तो भासता है
पर वो कृतकृत्य हो चुके हैं
उनका ना फिर किसी से कोई प्रयोजन रहता है
तीसरे वे हैं जो जानते ही नहीं
हमसे कौन प्रेम करता है
और चौथे वे हैं जो जान बूझकर
अपना हित करने वालों को भी सताना चाहते हैं
उनसे भी द्रोह रखते हैं
गोपियों मैं तो प्रेम करने वालों से भी
प्रेम का वैसा व्यवहार ना कर पाता हूँ
जैसे करना चाहिए
और ऐसा मैं इसलिए करता हूँ
ताकि उनकी चितवृत्ति मुझमे लगी रहे
निरंतर मेरा ही ध्यान उन्हें बना रहे
इसलिए ही उन्हें
मिल मिल कर छुप  जाता हूँ
और इस तरह
उनका प्रेम बढाता हूँ
निस्संदेह तुम लोगों ने
लोग मर्यादा वेदमार्ग
सगे सम्बन्धियों को त्यागा है
तभी मुझे पाया है
अब तुम्हारी मनोवृत्ति
मुझमे लगी रहे
निरंतर मेरा ही चिंतन तुम्हें होता रहे
इसलिए परोक्ष रूप से
तुमसे प्रेम करता हुआ भी
मैं छुप गया था
इसलिए मेरे प्रेम में
तुम ना दोष निकलना
तुम मेरी सर्वथा प्यारी हो
जन्म जन्म के लिए
तुम्हारा ऋणी हुआ  हूँ
क्योंकि तुमने उन बेड़ियों को तोडा है
जिसे बड़े बड़े ऋषि मुनि भी ना तोड़ पाते हैं
यदि मैं अपने अमर शरीर से
अमर जीवन से
अनंत काल तक
तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का
बदला चुकाना चाहूँ
तो भी ना चुका सकता हूँ
और तुम्हारे ऋण से ना कभी
उऋण हो सकता हूँ
प्रभु के मुख से उनकी
सुमधुर वाणी सुन
जो विरह्जन्य ताप शेष था
उससे गोपियाँ मुक्त हुईं
अब प्रभु ने यमुना के पुलिन पर
गोपियों संग रासलीला प्रारंभ की 


क्रमश:…………