Saturday, June 9, 2012

कृष्ण लीला……भाग 52




प्रभु नित्य नयी लीला करते हैं
जन जन को मोहित करते हैं
इक दिन ग्वाल बालों की इच्छा पर
मोहन मुरली बजाने लगे
मुरली की धुन सुन 
जड़ चेतन मोहित हो गए
यमुना का जल ठहर गया
पक्षी उड़ना भूल गए
गायों ने चरना छोड़ दिया
बछड़े दूध पीना भूल गए
मृगादिक चित्रलिखे से 
खड़े रह गए
देवता भी स्त्रियों सहित
आकाश में आ गए
पुष्प  वर्षा करने लगे
जड़ चेतन में ना कुछ भेद रहा
दिव्य गुंजार होने लगा 
मुरली ने यूँ सम्मोहित किया
मनहर प्यारे ने सबका मन हर लिया
बंसी की धुन सुन 
गोपियाँ सुध बुध भूल गयीं
प्रभु की मोहक छवि में डूब गयीं
जब ब्रजनाथ का दर्शन होगा
अब तो तभी आँखों को चैन मिलेगा
दूसरी गोपी बतियाने लगी
ना जाने कौन सा है गुण भरा 
जो बंसी ने उनके ह्रदय पर राज किया
क्षण भर ना अलग ये होती है
अधरामृत को ही पीती है
तीसरी गोपी कहने लगी
इस बंसी ने बांस के तन से जन्म लिया
धूप , बारिश , ताप सहा
एक पाँव पर खडी रह
प्रभु का तप किया
फिर पोर पोर कटवाकर
आँच का ताप सहा 
तब जाकर इसने सीधापन पाया
निश्छल निष्कपट ही प्रभु के मन को भाया
ऐसा तप ना किसी ने किया 
तभी तो प्रभु ने इसका वरण किया 
एक ब्रजबाला बोली 
प्रभु मुझे बांस  बना देता 
फिर आठों याम मोहन के 
अधरों से लगी रहती 
नित्य अमृत चखा करती
इक बोली देखो तो ज़रा
कैसे प्रभु के अधरों पर 
शोभा देती है
जिसके पोर पोर में
प्रभु अपना रस भर देते हैं
जिसे सुन मुर्दे भी जी उठते हैं
जिस वन में इसका बांस उगा
उसके जाति भाई भी खुश होते हैं 
इसकी धुन सुन देवताओं की
स्त्रियाँ भी सुध बुध खो देती हैं
कब कमर से घुँघरू गिरते हैं
कब केश खुल जाते हैं
ज़रा सी सुध नहीं रहती
बस प्रभु मिलन की 
आकांक्षा जगती है


इक बोली देवियों की तो बात ही क्या
जब मोहन मुरली में स्वर फूंकते हैं
गौएं अपने कर्ण दोने खड़े कर लेती हैं
मानो अमृत पान कर रही हों
नेत्रों से अश्रुपात होने लगता है
और बच्चों की दशा तो निराली होती है
गायों के थनों से दूध
स्वयमेव झरने लगता है
जब वो दुग्धपान करते करते
मधुर तान श्रवण करते हैं
तब मूँह में लिया घूँट 
ना उगल पाते हैं
ना निगल पाते हैं
और आनंद विभोर हो जाते हैं
नयनों से सावन भादों 
बरसने लगते हैं
कुछ ऐसे सुध बुध बिसरा देते हैं
एक सखी बोली ये
तो घर की वस्तु हैं
पक्षियों को तो देखो
वंशी की धुन सुन
निर्मिमेष दृष्टि से 
योगी की तरह स्थिर 
आसन हो जाता है
अपलक निहारा करते हैं
इक सखी बोली 
चेतन का तो कहना क्या
जड़ नदियों को ज़रा निहारो
इनमे पड़ते भंवर 
मोहन से मिलन की 
तीव्र आकांक्षा को इंगित करते हैं
मानो तरंगों ने प्रभु के
चरण कमलों को पकड़ा हो
अपना ह्रदय निछावर किया हो
इक सखी बोली
ये तो फिर सब 
वृन्दावन की वस्तु हैं
कैसे ना प्रभु पर रीझेंगी
पर उन बादलों को तो देखो
जब मोहन धूप में 
गौएं चराते हैं 
और बांसुरी बजाते हैं
तब इनमे प्रेम उमड़ आता है
और श्याम पर श्यामघन
मंडराने लगते हैं
श्वेत कुसुम सी बूँदें गिरने लगती हैं
मानो सर्वस्व प्रभु को 
अर्पण कर रहे हों 
निश्छल प्रेम को समर्पण कर रहे हों
इक सखी कहने लगी
वो भिलनियाँ भाग्यशाली हैं
जो प्रभु प्रेम में 
विह्वल हुई जाती हैं 
जब प्रभु घास पर चलते हैं
उस पर उन चरणों की 
केसर लग जाती है
जिसे वो अपने ह्रदय और 
मुख पर मल लेती हैं 
कुछ विरह पीड़ा शांत कर लेती हैं
इक सखी कहने लगी
वो गिरिराज गोवर्धन का
भाग्य निराला है
प्राणवल्लभ के चरणों का
स्पर्श पाता है
और खूब इठलाता है
उस सा भाग्य ना कोई पाता है


इस वंशी ने तो 
सबका मन लुभाया है
सखी बस हमें ही बिसराया है
मोहन की छवि ही समायी रहती है
आँखों की किवड़िया ना बंद होती है
इस जादूभरी  वंशी का 
जादू निराला है 
वृन्दावन वासियों को जिसने
मोहित कर डाला है
इक दिन सुने बिना भी
जियरा चैन ना पाता है 
सखी मोहन की वंशी की तान
में ही हमारा चैन मुकाम पाता है
ऐसे वंशी का गुणगान 
नित्य किया करती हैं
ह्रदय तपन मिटाया करती हैं 
यूँ सारा दिन गुजारा करती हैं 
और संध्या समय गोधूलि वेला मे 
प्रभु को निहार अपने नयनों को 
शीतल किया करती हैं 
हर पल बस मोहन की 
लीलाएं निहारा करती हैं



क्रमश:…………

कृष्ण लीला……भाग 52




प्रभु नित्य नयी लीला करते हैं
जन जन को मोहित करते हैं
इक दिन ग्वाल बालों की इच्छा पर
मोहन मुरली बजाने लगे
मुरली की धुन सुन 
जड़ चेतन मोहित हो गए
यमुना का जल ठहर गया
पक्षी उड़ना भूल गए
गायों ने चरना छोड़ दिया
बछड़े दूध पीना भूल गए
मृगादिक चित्रलिखे से 
खड़े रह गए
देवता भी स्त्रियों सहित
आकाश में आ गए
पुष्प  वर्षा करने लगे
जड़ चेतन में ना कुछ भेद रहा
दिव्य गुंजार होने लगा 
मुरली ने यूँ सम्मोहित किया
मनहर प्यारे ने सबका मन हर लिया
बंसी की धुन सुन 
गोपियाँ सुध बुध भूल गयीं
प्रभु की मोहक छवि में डूब गयीं
जब ब्रजनाथ का दर्शन होगा
अब तो तभी आँखों को चैन मिलेगा
दूसरी गोपी बतियाने लगी
ना जाने कौन सा है गुण भरा 
जो बंसी ने उनके ह्रदय पर राज किया
क्षण भर ना अलग ये होती है
अधरामृत को ही पीती है
तीसरी गोपी कहने लगी
इस बंसी ने बांस के तन से जन्म लिया
धूप , बारिश , ताप सहा
एक पाँव पर खडी रह
प्रभु का तप किया
फिर पोर पोर कटवाकर
आँच का ताप सहा 
तब जाकर इसने सीधापन पाया
निश्छल निष्कपट ही प्रभु के मन को भाया
ऐसा तप ना किसी ने किया 
तभी तो प्रभु ने इसका वरण किया 
एक ब्रजबाला बोली 
प्रभु मुझे बांस  बना देता 
फिर आठों याम मोहन के 
अधरों से लगी रहती 
नित्य अमृत चखा करती
इक बोली देखो तो ज़रा
कैसे प्रभु के अधरों पर 
शोभा देती है
जिसके पोर पोर में
प्रभु अपना रस भर देते हैं
जिसे सुन मुर्दे भी जी उठते हैं
जिस वन में इसका बांस उगा
उसके जाति भाई भी खुश होते हैं 
इसकी धुन सुन देवताओं की
स्त्रियाँ भी सुध बुध खो देती हैं
कब कमर से घुँघरू गिरते हैं
कब केश खुल जाते हैं
ज़रा सी सुध नहीं रहती
बस प्रभु मिलन की 
आकांक्षा जगती है


इक बोली देवियों की तो बात ही क्या
जब मोहन मुरली में स्वर फूंकते हैं
गौएं अपने कर्ण दोने खड़े कर लेती हैं
मानो अमृत पान कर रही हों
नेत्रों से अश्रुपात होने लगता है
और बच्चों की दशा तो निराली होती है
गायों के थनों से दूध
स्वयमेव झरने लगता है
जब वो दुग्धपान करते करते
मधुर तान श्रवण करते हैं
तब मूँह में लिया घूँट 
ना उगल पाते हैं
ना निगल पाते हैं
और आनंद विभोर हो जाते हैं
नयनों से सावन भादों 
बरसने लगते हैं
कुछ ऐसे सुध बुध बिसरा देते हैं
एक सखी बोली ये
तो घर की वस्तु हैं
पक्षियों को तो देखो
वंशी की धुन सुन
निर्मिमेष दृष्टि से 
योगी की तरह स्थिर 
आसन हो जाता है
अपलक निहारा करते हैं
इक सखी बोली 
चेतन का तो कहना क्या
जड़ नदियों को ज़रा निहारो
इनमे पड़ते भंवर 
मोहन से मिलन की 
तीव्र आकांक्षा को इंगित करते हैं
मानो तरंगों ने प्रभु के
चरण कमलों को पकड़ा हो
अपना ह्रदय निछावर किया हो
इक सखी बोली
ये तो फिर सब 
वृन्दावन की वस्तु हैं
कैसे ना प्रभु पर रीझेंगी
पर उन बादलों को तो देखो
जब मोहन धूप में 
गौएं चराते हैं 
और बांसुरी बजाते हैं
तब इनमे प्रेम उमड़ आता है
और श्याम पर श्यामघन
मंडराने लगते हैं
श्वेत कुसुम सी बूँदें गिरने लगती हैं
मानो सर्वस्व प्रभु को 
अर्पण कर रहे हों 
निश्छल प्रेम को समर्पण कर रहे हों
इक सखी कहने लगी
वो भिलनियाँ भाग्यशाली हैं
जो प्रभु प्रेम में 
विह्वल हुई जाती हैं 
जब प्रभु घास पर चलते हैं
उस पर उन चरणों की 
केसर लग जाती है
जिसे वो अपने ह्रदय और 
मुख पर मल लेती हैं 
कुछ विरह पीड़ा शांत कर लेती हैं
इक सखी कहने लगी
वो गिरिराज गोवर्धन का
भाग्य निराला है
प्राणवल्लभ के चरणों का
स्पर्श पाता है
और खूब इठलाता है
उस सा भाग्य ना कोई पाता है


इस वंशी ने तो 
सबका मन लुभाया है
सखी बस हमें ही बिसराया है
मोहन की छवि ही समायी रहती है
आँखों की किवड़िया ना बंद होती है
इस जादूभरी  वंशी का 
जादू निराला है 
वृन्दावन वासियों को जिसने
मोहित कर डाला है
इक दिन सुने बिना भी
जियरा चैन ना पाता है 
सखी मोहन की वंशी की तान
में ही हमारा चैन मुकाम पाता है
ऐसे वंशी का गुणगान 
नित्य किया करती हैं
ह्रदय तपन मिटाया करती हैं 
यूँ सारा दिन गुजारा करती हैं 
और संध्या समय गोधूलि वेला मे 
प्रभु को निहार अपने नयनों को 
शीतल किया करती हैं 
हर पल बस मोहन की 
लीलाएं निहारा करती हैं



क्रमश:…………

Monday, June 4, 2012

कृष्ण लीला ……भाग 51




इधर वर्षा ऋतु ने 
अपना रंग जमाया है 
ताप से दग्ध ह्रदयों को
शीतलता पहुँचाया है
घनघोर घन घिर घिर आते हैं
दामिनी दमकने लगती है
सूर्य चन्द्रमा तारे
सब ढक जाते है 
आकाश यूँ शोभा पाता है
मानो जैसे गुण स्वरुप  होने पर भी
जीव माया के आवरण में ढक जाता है
अपना स्वरुप भूल जाता है
आठ महीनों तक सूर्य ने
मानो पृथ्वी से जल ग्रहण किया हो
और अब  मानो उसने जल बरसा
राजा समान कर्त्तव्य निभाया हो
जैसे दयालु पुरुष दया परवश
अपना जीवन न्योछावर करते हों 
वर्षा ऋतु का निराला वर्णन किया है
वर्षा होने से चहुँ ओर
हरियाली का पहरा हुआ है
वृन्दावन की छटा तो 
जैसे बड़ी निराली है
वृक्ष फलों से लद गए हैं
पक्षी मीठी बोली बोलने लगे हैं
नदी- नाले तालाब सब भर गए हैं
पर्वतों से झर- झर झरने झर रहे हैं
वृक्षों की पंक्तियाँ मधुधरा
उंडेल रही हैं
गोप गोपियाँ मल्हार गाते हैं
वस्त्राभूषण पहन इठलाते हैं
ऐसे वर्षा ऋतु  ने रंग जमाया है
वृन्दावन को मोहक बनाया है
इसमें प्रभु मनोहारी लीलाएं करते हैं
सभी जीवों को सुख पहुंचाते हैं 


वर्षा ऋतु के बीतने पर
शरद ऋतु ने पदार्पण किया
जल भी निर्मल हो गया
वायु मंद बहने लगी
कमलों से जलाशय भरने लगे
मानो योगभ्रष्ट पुरुषों का चित्त 
निर्मल हो गया हो
और फिर से योग की तरफ
मुड गया हो
शरद ऋतु ने पृथ्वी की कीचड़
मटमैलापन सब मिटा दिया
जैसे भगवान की भक्ति  जीवों के 
कष्टों और अशुभों का नाश करती है 
समुद्र का जल भी 
धीर गंभीर और शांत हुआ
मानो आत्माराम पुरुष का मन
निः संकल्प होने पर शांत हुआ
जैसे राजा के आगमन से 
चोर डाकू छुप जाते हैं
और प्रजा निर्भय हो जाती है
वैसे ही सूर्योदय के कारण
कुमुदिनी को छोड़ 
सभी कमल खिल जाते हैं
ऐसी शरद ऋतु ने अब 
अपना प्रभाव बनाया है 
जिसने वृन्दावन को
खास बनाया है


क्रमश:…………

कृष्ण लीला ……भाग 51




इधर वर्षा ऋतु ने 
अपना रंग जमाया है 
ताप से दग्ध ह्रदयों को
शीतलता पहुँचाया है
घनघोर घन घिर घिर आते हैं
दामिनी दमकने लगती है
सूर्य चन्द्रमा तारे
सब ढक जाते है 
आकाश यूँ शोभा पाता है
मानो जैसे गुण स्वरुप  होने पर भी
जीव माया के आवरण में ढक जाता है
अपना स्वरुप भूल जाता है
आठ महीनों तक सूर्य ने
मानो पृथ्वी से जल ग्रहण किया हो
और अब  मानो उसने जल बरसा
राजा समान कर्त्तव्य निभाया हो
जैसे दयालु पुरुष दया परवश
अपना जीवन न्योछावर करते हों 
वर्षा ऋतु का निराला वर्णन किया है
वर्षा होने से चहुँ ओर
हरियाली का पहरा हुआ है
वृन्दावन की छटा तो 
जैसे बड़ी निराली है
वृक्ष फलों से लद गए हैं
पक्षी मीठी बोली बोलने लगे हैं
नदी- नाले तालाब सब भर गए हैं
पर्वतों से झर- झर झरने झर रहे हैं
वृक्षों की पंक्तियाँ मधुधरा
उंडेल रही हैं
गोप गोपियाँ मल्हार गाते हैं
वस्त्राभूषण पहन इठलाते हैं
ऐसे वर्षा ऋतु  ने रंग जमाया है
वृन्दावन को मोहक बनाया है
इसमें प्रभु मनोहारी लीलाएं करते हैं
सभी जीवों को सुख पहुंचाते हैं 


वर्षा ऋतु के बीतने पर
शरद ऋतु ने पदार्पण किया
जल भी निर्मल हो गया
वायु मंद बहने लगी
कमलों से जलाशय भरने लगे
मानो योगभ्रष्ट पुरुषों का चित्त 
निर्मल हो गया हो
और फिर से योग की तरफ
मुड गया हो
शरद ऋतु ने पृथ्वी की कीचड़
मटमैलापन सब मिटा दिया
जैसे भगवान की भक्ति  जीवों के 
कष्टों और अशुभों का नाश करती है 
समुद्र का जल भी 
धीर गंभीर और शांत हुआ
मानो आत्माराम पुरुष का मन
निः संकल्प होने पर शांत हुआ
जैसे राजा के आगमन से 
चोर डाकू छुप जाते हैं
और प्रजा निर्भय हो जाती है
वैसे ही सूर्योदय के कारण
कुमुदिनी को छोड़ 
सभी कमल खिल जाते हैं
ऐसी शरद ऋतु ने अब 
अपना प्रभाव बनाया है 
जिसने वृन्दावन को
खास बनाया है


क्रमश:…………

Tuesday, May 29, 2012

कृष्ण लीला ……भाग 50


दोस्तों आज प्रभु की असीम कृपा से कृष्ण लीला इस मुकाम तक पहुँच गयी और अपने 50 पायदान पूरे किये उम्मीद है प्रभु आगे भी कृपा बरसाते रहेंगे और लीला का आनन्द दिलवाते रहेंगे.उनकी लीला को लिखने की हिम्मत मुझ जैसी अदना जीव तो नही कर सकती थी बस सब उन्ही की अहैतुकी कृपा है ये जो वो शब्द बनकर उतर रहे हैं और मुझे माध्यम बनाया है । सबका उन्हीं का उन्हीं को समर्पित है।





इक दिन नटवर रूपधारी 
यमुना किनारे मुरली बजाते थे 
राधा प्यारी सखियों सहित 
पनिया भरन को आई थीं
ग्वालों की भीड़ देख घबरायी थीं
माखनचोर खड़ा राह में
ये जरूर अब छेड़ेगा
राधा ने सखियों से कहा
इधर श्यामसुंदर ने
राधा  का रुख जान लिया
और सखाओं सहित
रास्ता छोड़ दिया
जब राधे हंसिनी सी
चाल चलती घड़ा भर
गोपियों के बीच 
चली आती थीं
तभी कान्हा ने जुगत लडाई
गोपियों के बीच आ गए
और एक कंकरी गगरी में मार
मधुर मुस्कान से 
सबके मन का हरण किया 
ये देख एक चतुर सखी ये बोल पड़ी
मोहन क्या बिगाड़ा हमने तुम्हारा
जो राह में ठिठोली करते हो
मधुर मुस्कान तिरछी चितवन से 
प्राण और मन हर लेते हो
वंशी की धुन हमारा मन हर लेती है
कहो कहाँ से तुमने ये
चित चुराना सीखा है
इतना सुन मोहन बोले 
जैसे तुमने अपनी छवि से
मेरे मन को मोहा है
वैसे ही तुमको भी ऐसा लगता  है
तब गोपियाँ बोल उठीं
तुम तो कान्हा बहुत बरजोरी करते हो 
कभी चीर खींच लेते हो
कभी धक्का दे देते हो
कभी गगरी फोड़ देते हो
कभी माखन चुराते हो
बाज आ जाओ इन बातों से मोहन
नहीं मैया को हाल बतायेंगी
फिर ऊखल से तुम्हें बन्धवाएँगी
इतना कह गोपियों ने
यशोदा से जाकर कहा
कहते लज्जा आती है
ऐसे हमें सताते हैं
हम यमुना पर ना जा पाती हैं
नंदरानी तुम्हारे लाल की
सब करतूत  तुम्हें सुनाती हैं
तब यशोदा ने उत्तर दिया
जब ऊखल से बांध देती हूँ
तो खुद ही छुड़ाने आती हो
पूरी सजा भी ना देने पाती हूँ
आज आने दो कान्हा को
ऐसी मार लगाऊँगी
तुम्हारी राह ना रोकेगा
बस एक बार और क्षमा कर दो
कह गोपियों को विदा किया
कान्हा ओट में खड़े सब सुनते थे
जाकर बोले ,जो  भी गोपियाँ कहती हैं
तुम उसे सच मान लेती हो
पर उन गोपियों का 
चरित्र क्यों नहीं जान लेती हो
बरजोरी कर मुझे 
कदम्ब के नीचे  ले जाती हैं  
फिर गाल पर मुक्का मारती हैं
और जब मटक मटक कर चलती हैं
तब गगरी फूट जाती है
और मेरा नाम लगाती हैं
तुमसे शिकायत करती हैं
इतना सुन यशोदा  चंद्रमुख देख विह्वल हुई 
क्रोध करना सब भूल गयी
अपने प्यारे को गोद में बिठाया है
और समझाया है
मना करने पर भी
क्यों उनके समीप जाते  हो
ये झूठी ग्वालिने हीं झूठी बात बनाती  हैं 
और हम माँ बेटे को उलझाती हैं
प्रतिदिन नवलीला करते हैं
मोहन सभी को ऐसे सुख देते हैं





पूर्व जन्म  संस्कार से 
राधा की प्रीती निराली थी
मोहन मूर्ति के दरस बिना
ठौर  कहीं ना पाती थीं
लोकलाज का भय सताता था
बाहर नहीं जा पाती थीं
मगर घर में रहकर भी
राधे का मन 
कान्हा की तरफ दौड़ लगाता  था 

चित को बहुत समझाती थीं
पर चितचोर की तरफ से
मोड़ नहीं पाती थीं
जब राधा ने ऐसी दशा अपनी पाई
तब  कान्हा से प्रकट प्रीती की राह अपनाई
अपने दिल का हाल 
गोपियों को सुनाया है
सखी मुझे ना लगे प्यारा अब घर बार
लोक लाज को दिया है त्याग
विरह में जब प्राण जायेंगे निकल
तब लज्जा बोलो जाएगी किधर
अब मोहन को पति बनाना है
यही मैंने मन में ठाना है
सुन ललिता आदि सखियाँ बोली हैं
राधे तू बड़ी भोली है
उस मनमोहन की मूरत बहुत सलोनी है
जो सबका दिल चुराती है
वंशी की धुन से 
प्यारे ने सब पर मोहिनी डारी है
हमारा भी वो ही हाल हुआ है
संसार के जड़ चैतन्य जीवों का
कौन है जो ना मोहित हुआ है
गर प्यारे हमें अपनाते हैं
फिर लाज के घूघट पट हम हटाती हैं
और उनकी  प्यारी बन जाती हैं 
कुछ ऐसे गोपियाँ राधा संग बतलाती हैं 
उनके विरह में दिन गुजारा करती हैं
संध्या में दर्शन कर 
ह्रदय तपन मिटाया करती थीं


क्रमश: ……....






कृष्ण लीला ……भाग 50


दोस्तों आज प्रभु की असीम कृपा से कृष्ण लीला इस मुकाम तक पहुँच गयी और अपने 50 पायदान पूरे किये उम्मीद है प्रभु आगे भी कृपा बरसाते रहेंगे और लीला का आनन्द दिलवाते रहेंगे.उनकी लीला को लिखने की हिम्मत मुझ जैसी अदना जीव तो नही कर सकती थी बस सब उन्ही की अहैतुकी कृपा है ये जो वो शब्द बनकर उतर रहे हैं और मुझे माध्यम बनाया है । सबका उन्हीं का उन्हीं को समर्पित है।





इक दिन नटवर रूपधारी 
यमुना किनारे मुरली बजाते थे 
राधा प्यारी सखियों सहित 
पनिया भरन को आई थीं
ग्वालों की भीड़ देख घबरायी थीं
माखनचोर खड़ा राह में
ये जरूर अब छेड़ेगा
राधा ने सखियों से कहा
इधर श्यामसुंदर ने
राधा  का रुख जान लिया
और सखाओं सहित
रास्ता छोड़ दिया
जब राधे हंसिनी सी
चाल चलती घड़ा भर
गोपियों के बीच 
चली आती थीं
तभी कान्हा ने जुगत लडाई
गोपियों के बीच आ गए
और एक कंकरी गगरी में मार
मधुर मुस्कान से 
सबके मन का हरण किया 
ये देख एक चतुर सखी ये बोल पड़ी
मोहन क्या बिगाड़ा हमने तुम्हारा
जो राह में ठिठोली करते हो
मधुर मुस्कान तिरछी चितवन से 
प्राण और मन हर लेते हो
वंशी की धुन हमारा मन हर लेती है
कहो कहाँ से तुमने ये
चित चुराना सीखा है
इतना सुन मोहन बोले 
जैसे तुमने अपनी छवि से
मेरे मन को मोहा है
वैसे ही तुमको भी ऐसा लगता  है
तब गोपियाँ बोल उठीं
तुम तो कान्हा बहुत बरजोरी करते हो 
कभी चीर खींच लेते हो
कभी धक्का दे देते हो
कभी गगरी फोड़ देते हो
कभी माखन चुराते हो
बाज आ जाओ इन बातों से मोहन
नहीं मैया को हाल बतायेंगी
फिर ऊखल से तुम्हें बन्धवाएँगी
इतना कह गोपियों ने
यशोदा से जाकर कहा
कहते लज्जा आती है
ऐसे हमें सताते हैं
हम यमुना पर ना जा पाती हैं
नंदरानी तुम्हारे लाल की
सब करतूत  तुम्हें सुनाती हैं
तब यशोदा ने उत्तर दिया
जब ऊखल से बांध देती हूँ
तो खुद ही छुड़ाने आती हो
पूरी सजा भी ना देने पाती हूँ
आज आने दो कान्हा को
ऐसी मार लगाऊँगी
तुम्हारी राह ना रोकेगा
बस एक बार और क्षमा कर दो
कह गोपियों को विदा किया
कान्हा ओट में खड़े सब सुनते थे
जाकर बोले ,जो  भी गोपियाँ कहती हैं
तुम उसे सच मान लेती हो
पर उन गोपियों का 
चरित्र क्यों नहीं जान लेती हो
बरजोरी कर मुझे 
कदम्ब के नीचे  ले जाती हैं  
फिर गाल पर मुक्का मारती हैं
और जब मटक मटक कर चलती हैं
तब गगरी फूट जाती है
और मेरा नाम लगाती हैं
तुमसे शिकायत करती हैं
इतना सुन यशोदा  चंद्रमुख देख विह्वल हुई 
क्रोध करना सब भूल गयी
अपने प्यारे को गोद में बिठाया है
और समझाया है
मना करने पर भी
क्यों उनके समीप जाते  हो
ये झूठी ग्वालिने हीं झूठी बात बनाती  हैं 
और हम माँ बेटे को उलझाती हैं
प्रतिदिन नवलीला करते हैं
मोहन सभी को ऐसे सुख देते हैं





पूर्व जन्म  संस्कार से 
राधा की प्रीती निराली थी
मोहन मूर्ति के दरस बिना
ठौर  कहीं ना पाती थीं
लोकलाज का भय सताता था
बाहर नहीं जा पाती थीं
मगर घर में रहकर भी
राधे का मन 
कान्हा की तरफ दौड़ लगाता  था 

चित को बहुत समझाती थीं
पर चितचोर की तरफ से
मोड़ नहीं पाती थीं
जब राधा ने ऐसी दशा अपनी पाई
तब  कान्हा से प्रकट प्रीती की राह अपनाई
अपने दिल का हाल 
गोपियों को सुनाया है
सखी मुझे ना लगे प्यारा अब घर बार
लोक लाज को दिया है त्याग
विरह में जब प्राण जायेंगे निकल
तब लज्जा बोलो जाएगी किधर
अब मोहन को पति बनाना है
यही मैंने मन में ठाना है
सुन ललिता आदि सखियाँ बोली हैं
राधे तू बड़ी भोली है
उस मनमोहन की मूरत बहुत सलोनी है
जो सबका दिल चुराती है
वंशी की धुन से 
प्यारे ने सब पर मोहिनी डारी है
हमारा भी वो ही हाल हुआ है
संसार के जड़ चैतन्य जीवों का
कौन है जो ना मोहित हुआ है
गर प्यारे हमें अपनाते हैं
फिर लाज के घूघट पट हम हटाती हैं
और उनकी  प्यारी बन जाती हैं 
कुछ ऐसे गोपियाँ राधा संग बतलाती हैं 
उनके विरह में दिन गुजारा करती हैं
संध्या में दर्शन कर 
ह्रदय तपन मिटाया करती थीं


क्रमश: ……....