Saturday, December 3, 2011

कृष्ण लीला………भाग 26






यही सवाल परीक्षित जी ने
शुकदेव जी से किया
तब शुकदेव जी ने
इक कथा का वर्णन किया


पिछले जनम मे इन दोनो ने
बहुत कठिन तप था किया
जब इनका विवाह हुआ
प्रथम रात्रि में 
तब इन्होने एक प्रण लिया
गृह्स्थ धर्म तभी निभायेंगे
जब तप करके प्रभु को मनायेंगे
पति ने पत्नि के प्रण का मान रखा
और वन मे जा घोर तप किया
जो भी खाने को मिलता
उससे पहले अतिथि को संतुष्ट करते
बाद मे स्वंय भोजन करते
इक दिन पति लकडी काटने गये हुये थे
और घनघोर बारिश हो रही थी
तभी इक ब्राह्मण ब्राह्मणी का जोडा आया
भोजन करने की इच्छा को बतलाया
सुन वो घबरा गयी
मगर उनका आतिथ्य सत्कार किया
सोचने लगी पतिदेव को ना जाने कितना समय लगे
कहीं अतिथि भूखे ना रह जायें
ये सोच उन्हे बिठा स्वंय
महाजन की दुकान पर गयी
जाकर उससे अनुरोध किया
भैया थोडा अन्न उधार देना
जैसे ही पतिदेव आयेंगे
तुम्हारे पैसे चुकायेंगे
मेरे यहाँ अतिथि आये हैं
इंतज़ार मे बैठे हैं
इतना सुन महाजन ने सिर ऊपर किया
और जैसे ही उसे देखा
एक प्रस्ताव रख दिया
महाजन की नीयत डोल रही थी
उधर युवती मे तप की शक्ति समायी थी
तप की शक्ति से रूप लावण्य दमक रहा था
बिन श्रृंगार के भी चमक रहा था
दिव्य रूप को देख
महाजन का दिल भटक रहा था
एक काम करो तो
तुम्हे ना कुछ देना होगा
युवती ने पूछा कहो क्या करना होगा
इतना सुन महाजन ने
उसके वक्षस्थल की तरफ़ इशारा किया
मुझे ये चाहिये ……कह दिया
सुन वो देवी सन्न रह गयी
बहुत मन्नत चिरौरी करने लगी
पर जब ना महाजन माना 
बोली मैने तुम्हे भैया कहा है
कम से कम उसकी तो लाज रखी होती
पर जब तूने कीमत मांग ही ली है
तो तुझे जरूर मिलेगी
पर जैसे तू चाहता है
वैसे ना मिल पायेगी
इतना कह उसने
चाकू से दोनो स्तनो को काट दिया
और महाजन के मूँह पर फ़ेंक दिया
अब सामान ले दौडी जाती थी
ब्राह्मण देवता मै आ रही हूँ …कहती जाती थी
वक्षस्थल से लहू के पतनाले बहे जाते थे
पर उस तरफ़ ना उसका ध्यान गया था
उसे एक ही चिन्ता सताती थी
अतिथि कहीं भूखे ना चले जायें
बार- बार बेहोश हुई जाती थी
होश मे आने पर एक ही बात दोहराती थी
ब्राह्मण देवता मै आ रही हूँ ....
जैसे तैसे गिरती पडती
कुटिया पर ये कहती पहुंच गयी
जाना नही देवता मै आ गयी हूँ
कहते कहते बेहोश हुई
जैसे ही होश मे आयी
खुद को अजनबी की बाहो मे पाया
क्रोध से मुख तमतमा गया
कैसे अन्य पुरुष ने स्पर्श किया
मगर जैसे ही मुख देखा
सारा क्रोध काफ़ूर हुआ
वो तो शिव पार्वती नज़र आने लगे
इतने मे वो महाजन मे रूप मे छुपे
विष्णु भी आ गये
कहा तीनो ने तुम्हारे तप ने
हमे परीक्षा लेने पर विवश किया
पर तुम्हारे समर्पण के आगे हम हार गये
कहो क्या तुम चाहती हो
इतने मे उसके पतिदेव भी आ गये
सुन दोनो ने वरदान मांगा
परमेश्वर मे हमारी अनन्य प्रीती हो
दोनो को वरदान दे उन्होने कहा
देवि तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नही जायेगा
जैसा तुमने किया ऐसा ना
कभी कोई कर पाया है
तुम्हारे प्रेम का कर्ज़ चुका नही सकता
इसलिये बालरूप मे आऊँगा
और तब दुग्धपान कर
कुछ कर्ज़ चुकाऊंगा
अब भोले भंडारी बोले
मैया मै भी तेरे दर पर
फिर से भिखारी बन कर आऊँगा
पार्वती ने कहा मैया मै भी
शक्ति के रूप मे तेरे गर्भ से जनम लूंगी
वो ही माया के रूप मे
पार्वती ने जन्म लिया था
इतना कह तीनो अन्तर्धान हुये
उसी वरदान के प्रताप से
आज यशोदानन्दन पृथ्वी पर आये हैं
अपने बाल रूप के मैया को दर्शन कराये हैं


कमशः .................

कृष्ण लीला………भाग 26






यही सवाल परीक्षित जी ने
शुकदेव जी से किया
तब शुकदेव जी ने
इक कथा का वर्णन किया


पिछले जनम मे इन दोनो ने
बहुत कठिन तप था किया
जब इनका विवाह हुआ
प्रथम रात्रि में 
तब इन्होने एक प्रण लिया
गृह्स्थ धर्म तभी निभायेंगे
जब तप करके प्रभु को मनायेंगे
पति ने पत्नि के प्रण का मान रखा
और वन मे जा घोर तप किया
जो भी खाने को मिलता
उससे पहले अतिथि को संतुष्ट करते
बाद मे स्वंय भोजन करते
इक दिन पति लकडी काटने गये हुये थे
और घनघोर बारिश हो रही थी
तभी इक ब्राह्मण ब्राह्मणी का जोडा आया
भोजन करने की इच्छा को बतलाया
सुन वो घबरा गयी
मगर उनका आतिथ्य सत्कार किया
सोचने लगी पतिदेव को ना जाने कितना समय लगे
कहीं अतिथि भूखे ना रह जायें
ये सोच उन्हे बिठा स्वंय
महाजन की दुकान पर गयी
जाकर उससे अनुरोध किया
भैया थोडा अन्न उधार देना
जैसे ही पतिदेव आयेंगे
तुम्हारे पैसे चुकायेंगे
मेरे यहाँ अतिथि आये हैं
इंतज़ार मे बैठे हैं
इतना सुन महाजन ने सिर ऊपर किया
और जैसे ही उसे देखा
एक प्रस्ताव रख दिया
महाजन की नीयत डोल रही थी
उधर युवती मे तप की शक्ति समायी थी
तप की शक्ति से रूप लावण्य दमक रहा था
बिन श्रृंगार के भी चमक रहा था
दिव्य रूप को देख
महाजन का दिल भटक रहा था
एक काम करो तो
तुम्हे ना कुछ देना होगा
युवती ने पूछा कहो क्या करना होगा
इतना सुन महाजन ने
उसके वक्षस्थल की तरफ़ इशारा किया
मुझे ये चाहिये ……कह दिया
सुन वो देवी सन्न रह गयी
बहुत मन्नत चिरौरी करने लगी
पर जब ना महाजन माना 
बोली मैने तुम्हे भैया कहा है
कम से कम उसकी तो लाज रखी होती
पर जब तूने कीमत मांग ही ली है
तो तुझे जरूर मिलेगी
पर जैसे तू चाहता है
वैसे ना मिल पायेगी
इतना कह उसने
चाकू से दोनो स्तनो को काट दिया
और महाजन के मूँह पर फ़ेंक दिया
अब सामान ले दौडी जाती थी
ब्राह्मण देवता मै आ रही हूँ …कहती जाती थी
वक्षस्थल से लहू के पतनाले बहे जाते थे
पर उस तरफ़ ना उसका ध्यान गया था
उसे एक ही चिन्ता सताती थी
अतिथि कहीं भूखे ना चले जायें
बार- बार बेहोश हुई जाती थी
होश मे आने पर एक ही बात दोहराती थी
ब्राह्मण देवता मै आ रही हूँ ....
जैसे तैसे गिरती पडती
कुटिया पर ये कहती पहुंच गयी
जाना नही देवता मै आ गयी हूँ
कहते कहते बेहोश हुई
जैसे ही होश मे आयी
खुद को अजनबी की बाहो मे पाया
क्रोध से मुख तमतमा गया
कैसे अन्य पुरुष ने स्पर्श किया
मगर जैसे ही मुख देखा
सारा क्रोध काफ़ूर हुआ
वो तो शिव पार्वती नज़र आने लगे
इतने मे वो महाजन मे रूप मे छुपे
विष्णु भी आ गये
कहा तीनो ने तुम्हारे तप ने
हमे परीक्षा लेने पर विवश किया
पर तुम्हारे समर्पण के आगे हम हार गये
कहो क्या तुम चाहती हो
इतने मे उसके पतिदेव भी आ गये
सुन दोनो ने वरदान मांगा
परमेश्वर मे हमारी अनन्य प्रीती हो
दोनो को वरदान दे उन्होने कहा
देवि तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नही जायेगा
जैसा तुमने किया ऐसा ना
कभी कोई कर पाया है
तुम्हारे प्रेम का कर्ज़ चुका नही सकता
इसलिये बालरूप मे आऊँगा
और तब दुग्धपान कर
कुछ कर्ज़ चुकाऊंगा
अब भोले भंडारी बोले
मैया मै भी तेरे दर पर
फिर से भिखारी बन कर आऊँगा
पार्वती ने कहा मैया मै भी
शक्ति के रूप मे तेरे गर्भ से जनम लूंगी
वो ही माया के रूप मे
पार्वती ने जन्म लिया था
इतना कह तीनो अन्तर्धान हुये
उसी वरदान के प्रताप से
आज यशोदानन्दन पृथ्वी पर आये हैं
अपने बाल रूप के मैया को दर्शन कराये हैं


कमशः .................

Wednesday, November 30, 2011

कृष्ण लीला .........भाग २५





मैया को बातों का भुलावा दिया 
मीठी मीठी बातों से उसका तो मन मोह लिया 
मगर कान्हा कब मानने वाले थे
थोड़ी देर बाद ही फिर 
घर से निकल पड़े
और इक गोपी के 
पीछे पीछे चल पड़े
उसका पल्लू खींचने लगे
गोपी से मनुहार करने लगे
ए गोपी थोडा सा माखन खिला दे ना
ए गोपी देख तेरे माखन में 
कितना स्वाद है
इतना तो माँ यशोदा के 
माखन में भी नहीं है
ए गोपी सुन ना 
कह - कह पीछे पड़ गए
गोपी मन ही मन मुस्काती है
कान्हा की मीठी बातों पर
रीझी जाती है
मगर ऊपर से नखरे दिखाती है
कान्हा मान जाओ
ना तो मैया से जाकर कह दूंगी
तुम हमें तंग करते हो
तुम्हारे यहाँ इतना माखन है
वो क्यूँ नहीं खाते हो 
तुम्हारे माखन में मुझे
दिव्य आनंद आता है
अच्छा जो तुम कहोगी
मैं कर दूंगा
बस एक बार माखन खिला दो ना
जब कान्हा ने ये कहा
तो गोपी ने कान्हा से 
गोबर के उपले उठाने को कहा
जितने उपले तुम उठाओगे
उतने ही माखन के लड्डू खिलाऊँगी
मुझे कैसे पता चलेगा 
तुम बेईमानी कर जाओगी
कान्हा बोल पड़े
सुन गोपी बोली
जितने उपले उठाओगे
उतनी बिंदियाँ तुम्हारे गाल पर
गोबर के लगाती जाउंगी
फिर उतने लड्डू माखन के तुम खा लेना
अब कान्हा छोटे- छोटे हाथों से
उपले उठते जाते हैं
गोपी उनके मुख पर 
गोबर की बिंदियाँ लगाये जाती है
यूँ गोपी ने कान्हा का सारा मुख
गोबर की बिंदियों से भर दिया
जिसे देख गोपी का मन अति हर्षित हुआ
सुख के सागर में डूब गयी
ये कैसी छवि बन गयी
आज तो कान्हा गज़ब के लगते हैं
कैसे श्यामल सूरत पर 
गोबर के बिंदु चमकते हैं
ज्यूँ ओस कण पुष्प पर मचल रहे हों
इस तरह सबको सुख पहुंचाते हैं
क्यूँकि सुख पहुँचाने के लिए ही तो
कान्हा पृथ्वी पर आये हैं
गोपियाँ इसी छवि को देखने को तो तरसती हैं
तभी रोज कान्हा का आवाहन करती हैं 




इक दिन इक गोपी
चारपाई पर सोयी थी
नन्दलाला ने उसकी चोटी
चारपायी से बांधी थी
और ग्वालबालो संग
आनन्द से माखन खाया था
बर्तनो को फ़ोड डाला
आवाज़ सुन गोपी जाग गयी
पर चारपायी से उठ ना पायी
लेटे लेटे शोर मचाया
दूजी गोपी ने पकड लिया
यशोदा निकट ले आई
माखनचोर की करतूत बताई
कैसे घर के बर्तन फ़ोडा करता है
राह चलती गोपियों के
सिर से पल्लू खींचा करता है
कभी दधि की मटकी फ़ोडा करता है
हम राह चल नही पाती हैं
तुम्हारे लाल ने बडा उधम मचाया है
गोपियो की बाते मैया को सच्ची लगने लगीं
तब कान्हा को यशोदा कहने लगी
तुम चोरी क्यो करते हो
ये गन्दा काम कहाँ से सीखा
अगर नही मानोगे तो
घर मे बांध बिठा दूंगी
रोज ऐसी प्यारी प्यारी लीलाये करते है
मोहन गोपियो का मन हरते हैं
जिसे देख देख सुर भी लरजते हैं
और एक ही बात कहते हैं
कौन सा ऐसा पुण्य कर्म किया
जिसका पार वेदो ने भी ना पाया है
वो ब्रह्म साक्षात धरती पर उतर आया है


यही सवाल परीक्षित जी ने
शुकदेव जी से किया
तब शुकदेव जी ने
इक कथा का वर्णन किया


क्रमशः .............