Friday, July 22, 2011

कृष्ण लीला………भाग 3

अब पृथ्वी बहुत घबरायी थी
गौ का रूप रख ब्रह्मा के पास आई थी
ब्रह्मा जी कहने लगे
इसका उपाय तो
विष्णु जी ही बताएँगे
और गौ को ले सभी देवता
महादेव सहित क्षीरसागर किनारे
करबद्ध प्रार्थना करने लगे
प्रभु तारनहारे
हमारी नैया पार लगा देना
जैसे ग्राह से गज को छुड़ाया
परशुराम अवतार लिया
पृथ्वी को क्षत्रिय रहित किया
ब्राह्मणों का उद्धार किया
राम रूप में भी
पृथ्वी का भार हरण किया
हर बार पृथ्वी के भार
को आपने दूर किया
इस बार भी उसकी
नैया पार लगाइए
अब देर ना लगाओ प्रभु
पृथ्वी भयातुर हो गयी है
आपकी शरण में आ गयी है
अब इसकी रक्षा कीजिये
पृथ्वी भार हरण के लिए
अब प्रभु अवतार लीजिये
स्तुति सुन आकाशवाणी हुई
पृथ्वी तुम डरो नहीं
जल्द मैं अवतार लूँगा
देवकी के गर्भ से जन्म लूँगा
यशोदा को  पालन का सुख दूंगा
जो भी सेवा करना चाहे
बाल लीलाओं का आनंद लेना चाहे
जाकर गोकुल में जन्म ले ले
इतना सुन सब आनंदमग्न हो गए
प्रभु गुणों को गाते
निज स्थानों पर गए
अब प्रभु जन्म की आस में
ज़िन्दगी बिताने लगे
देवताओं , गन्धर्व , किन्नर
ऋषि मुनि आदि ने
ब्रजक्षेत्र  में जन्म लिया
वेदों की ऋचाओं  ने
गोपी रूप धारण किया


इसके आगे शुकदेव जी कहने लगे
जब कंस का अत्याचार बढ़ा
तब उसने विचार किया
कुछ अच्छा कार्य करना चाहिए
सबके दिलों में सम्मान भी पाना चाहिए
इतना सोच उसने अपने
चाचा की लाडली देवकी का ब्याह तय किया
 देवकी का ब्याह कंस
वासुदेव से करने लगा
और बहुत धूम धाम से ब्याह किया
दान दहेज़ बहुत मन से दिया
प्रेम के वशीभूत हो
विदाई रथ को कंस
जब स्वयं हांकने लगा
तभी आकाशवाणी ने उद्घोष किया
जिसे इतने हर्ष से ले जाता है
उसी देवकी का आठवां पुत्र
तुझे चिरनिद्रा में सुलाएगा
तू काल के फंदे से ना बच पायेगा
इतना सुन कंस क्रोध से भर गया
अंग प्रत्यंग क्रोध  से जलने लगा
देवकी के बाल खींच जब
तलवार से उसे मारने लगा
तब वासुदेव जी ने विचार किया
अब ये इसकी बहन नहीं
मेरी भार्या है
और इसकी रक्षा करना
मेरा धरम होगा
वासुदेव धर्मनिष्ठ और सत्यव्रती थे
ये कंस जानता था
जब वासुदेव ने वचन दिया
अपना हर पुत्र तुम्हें भेंट करूँगा
चाहे जो कर लेना
मगर देवकी से कोई खतरा नहीं तुम्हें
इसलिए उसे छोड़ देना
सूर्य चंद्रमा को साक्षी जान
तुम्हें वचन मैं देता हूँ
इतना सुन कंस ने उन्हें छोड़ दिया



क्रमश:

कृष्ण लीला………भाग 3

अब पृथ्वी बहुत घबरायी थी
गौ का रूप रख ब्रह्मा के पास आई थी
ब्रह्मा जी कहने लगे
इसका उपाय तो
विष्णु जी ही बताएँगे
और गौ को ले सभी देवता
महादेव सहित क्षीरसागर किनारे
करबद्ध प्रार्थना करने लगे
प्रभु तारनहारे
हमारी नैया पार लगा देना
जैसे ग्राह से गज को छुड़ाया
परशुराम अवतार लिया
पृथ्वी को क्षत्रिय रहित किया
ब्राह्मणों का उद्धार किया
राम रूप में भी
पृथ्वी का भार हरण किया
हर बार पृथ्वी के भार
को आपने दूर किया
इस बार भी उसकी
नैया पार लगाइए
अब देर ना लगाओ प्रभु
पृथ्वी भयातुर हो गयी है
आपकी शरण में आ गयी है
अब इसकी रक्षा कीजिये
पृथ्वी भार हरण के लिए
अब प्रभु अवतार लीजिये
स्तुति सुन आकाशवाणी हुई
पृथ्वी तुम डरो नहीं
जल्द मैं अवतार लूँगा
देवकी के गर्भ से जन्म लूँगा
यशोदा को  पालन का सुख दूंगा
जो भी सेवा करना चाहे
बाल लीलाओं का आनंद लेना चाहे
जाकर गोकुल में जन्म ले ले
इतना सुन सब आनंदमग्न हो गए
प्रभु गुणों को गाते
निज स्थानों पर गए
अब प्रभु जन्म की आस में
ज़िन्दगी बिताने लगे
देवताओं , गन्धर्व , किन्नर
ऋषि मुनि आदि ने
ब्रजक्षेत्र  में जन्म लिया
वेदों की ऋचाओं  ने
गोपी रूप धारण किया


इसके आगे शुकदेव जी कहने लगे
जब कंस का अत्याचार बढ़ा
तब उसने विचार किया
कुछ अच्छा कार्य करना चाहिए
सबके दिलों में सम्मान भी पाना चाहिए
इतना सोच उसने अपने
चाचा की लाडली देवकी का ब्याह तय किया
 देवकी का ब्याह कंस
वासुदेव से करने लगा
और बहुत धूम धाम से ब्याह किया
दान दहेज़ बहुत मन से दिया
प्रेम के वशीभूत हो
विदाई रथ को कंस
जब स्वयं हांकने लगा
तभी आकाशवाणी ने उद्घोष किया
जिसे इतने हर्ष से ले जाता है
उसी देवकी का आठवां पुत्र
तुझे चिरनिद्रा में सुलाएगा
तू काल के फंदे से ना बच पायेगा
इतना सुन कंस क्रोध से भर गया
अंग प्रत्यंग क्रोध  से जलने लगा
देवकी के बाल खींच जब
तलवार से उसे मारने लगा
तब वासुदेव जी ने विचार किया
अब ये इसकी बहन नहीं
मेरी भार्या है
और इसकी रक्षा करना
मेरा धरम होगा
वासुदेव धर्मनिष्ठ और सत्यव्रती थे
ये कंस जानता था
जब वासुदेव ने वचन दिया
अपना हर पुत्र तुम्हें भेंट करूँगा
चाहे जो कर लेना
मगर देवकी से कोई खतरा नहीं तुम्हें
इसलिए उसे छोड़ देना
सूर्य चंद्रमा को साक्षी जान
तुम्हें वचन मैं देता हूँ
इतना सुन कंस ने उन्हें छोड़ दिया



क्रमश:

Sunday, July 17, 2011

कृष्ण लीला ----भाग 2

तब शुकदेव जी कहने लगे
आहुक राजा के दो पुत्र थे
देवक और उग्रसेन
उग्रसेन महाप्रतापी  राजा था
पवन रेखा  उसकी भार्या
अति सुन्दरी पतिव्रता थी
कालसंयोग से इक दिन
वनविहार के समय
बिछड़ गयी राजा और सखियों से
घने जंगल में पहुँच गयी
द्रुम्लिक नामक दैत्य के
मन को भा गयी
उसकी कुदृष्टि से बच ना पाई
राजा का धर वेश उसने
रानी का शील हरण किया
और फिर निज स्वरुप में आ गया
उसे देख रानी का कलेजा थर्राया
रानी ने राक्षस को धिक्कारा
और श्राप देने का उपक्रम किया
तब वो राक्षस  बोल उठा
रानी श्राप मत देना
तेरी बंद कोख को खोला है
और अपने धर्म का फल
तुझे दिया है
अब जो पुत्र तेरे उत्पन्न होगा
महाप्रतापी चक्रवर्ती राजा होगा
और परमेश्वर के हाथों
उसका उद्धार होगा
मैं पिछले जन्म का कालनेमि हूँ
हनुमान जी के हाथों मारा गया था
इतना कह राक्षस चला गया
पवन रेखा  ईश्वर इच्छा समझ
स्वयं को धैर्य देने लगी
जब शिशु जन्म का समय आया
पृथ्वी पर भारी उपद्रव हुआ
दिशायें सारी भयभीत हुईं
दिन में अँधियारा  होने लगा
बादल सिंह गर्जन करने लगे
दामिनी भी कड़कने लगी
वृक्ष धराशायी होने लगे
आंधियां तेज़ चलने लगीं
तारे टूटने लगे
उल्कापात होने लगे
ऐसे में बालक ने जन्म लिया

राजा ने पुत्र जन्म का
खूब उत्सव किया
दान दक्षिणा से याचकों का
घर बार भर दिया
ज्योतिषियों से बालक की
कुंडली बंचवायी है
कुंडली सुन राजा परम दुखी हुआ
जब पता चला
गौ , ब्राह्मण, देवताओं को
दुख  देने वाला होगा
यज्ञ ,दान, तपस्या करने वालों
पर अत्याचार करेगा
राजसिंघासन  छीन प्रजा को दुःख देगा
जब पृथ्वी दुखी होगी
तब परमात्मा जन्म लेकर
इसका उद्धार करेंगे
इतना सुन राजा दुखी हुआ
परमेश्वर की इच्छा जान संतोष किया 

राजा ने एक डलिया मे
बालक को लिटाया है
और यमुना मे बहाया है
बहते बहते बालक शूरसेन को मिल गया
वो उसे अपने घर लाये हैं
और वसुदेव संग दोनो ने
साथ साथ शिक्षा पाई है
जब दोनो बडे हो गये
तब इक दिन नारद जी
उससे मिलने आये हैं
और उसे उसके जीवन का
सब हाल बतलाये हैं
इतना सुन कंस क्रोधित हो उठा
और बदला लेने को
आतुर हो गया
उसने जा घोर तपस्या कर
ब्रह्मदेव को प्रसन्न कर
दस हजार हाथियो का बल पाया
और राजधानी मे आ उत्पात मचाया
अपने पिता को बंदी बनाया 
जैसा भूदेवों ने बतलाया था
वैसा ही उसने आचरण पाया था
कंस के अत्याचारों से
पृथ्वी का ह्रदय डोलने लगा
दस हजार हाथियों का बल
तपस्या में पाया था
उसके अत्याचार से
सबका मन थर्राया था
पूजा पाठ यज्ञ हवन
बंद करवा दिए

इक दिन जरासंध का 
एक हाथी पगला गया था
रास्ते से जाते कंस ने
उसे वश किया था
जरासंध ने उसके पौरुष
पर खुश हो
अपनी दो बेटियों
अस्ति और प्राप्ति
का उससे ब्याह किया
अस्ति और प्राप्ति
जैसे नाम थे वैसे ही
कंस के आचरण बनने लगे
अस्ति का मतलब" है "
और प्राप्ति कर अर्थ " इतना और पाना है "
बस इसी उहापोह में लग गया
घमंड से फूला ना समाता था
प्रजा पर मनमाने अत्याचार किया करता



क्रमश:

कृष्ण लीला ----भाग 2

तब शुकदेव जी कहने लगे
आहुक राजा के दो पुत्र थे
देवक और उग्रसेन
उग्रसेन महाप्रतापी  राजा था
पवन रेखा  उसकी भार्या
अति सुन्दरी पतिव्रता थी
कालसंयोग से इक दिन
वनविहार के समय
बिछड़ गयी राजा और सखियों से
घने जंगल में पहुँच गयी
द्रुम्लिक नामक दैत्य के
मन को भा गयी
उसकी कुदृष्टि से बच ना पाई
राजा का धर वेश उसने
रानी का शील हरण किया
और फिर निज स्वरुप में आ गया
उसे देख रानी का कलेजा थर्राया
रानी ने राक्षस को धिक्कारा
और श्राप देने का उपक्रम किया
तब वो राक्षस  बोल उठा
रानी श्राप मत देना
तेरी बंद कोख को खोला है
और अपने धर्म का फल
तुझे दिया है
अब जो पुत्र तेरे उत्पन्न होगा
महाप्रतापी चक्रवर्ती राजा होगा
और परमेश्वर के हाथों
उसका उद्धार होगा
मैं पिछले जन्म का कालनेमि हूँ
हनुमान जी के हाथों मारा गया था
इतना कह राक्षस चला गया
पवन रेखा  ईश्वर इच्छा समझ
स्वयं को धैर्य देने लगी
जब शिशु जन्म का समय आया
पृथ्वी पर भारी उपद्रव हुआ
दिशायें सारी भयभीत हुईं
दिन में अँधियारा  होने लगा
बादल सिंह गर्जन करने लगे
दामिनी भी कड़कने लगी
वृक्ष धराशायी होने लगे
आंधियां तेज़ चलने लगीं
तारे टूटने लगे
उल्कापात होने लगे
ऐसे में बालक ने जन्म लिया

राजा ने पुत्र जन्म का
खूब उत्सव किया
दान दक्षिणा से याचकों का
घर बार भर दिया
ज्योतिषियों से बालक की
कुंडली बंचवायी है
कुंडली सुन राजा परम दुखी हुआ
जब पता चला
गौ , ब्राह्मण, देवताओं को
दुख  देने वाला होगा
यज्ञ ,दान, तपस्या करने वालों
पर अत्याचार करेगा
राजसिंघासन  छीन प्रजा को दुःख देगा
जब पृथ्वी दुखी होगी
तब परमात्मा जन्म लेकर
इसका उद्धार करेंगे
इतना सुन राजा दुखी हुआ
परमेश्वर की इच्छा जान संतोष किया 

राजा ने एक डलिया मे
बालक को लिटाया है
और यमुना मे बहाया है
बहते बहते बालक शूरसेन को मिल गया
वो उसे अपने घर लाये हैं
और वसुदेव संग दोनो ने
साथ साथ शिक्षा पाई है
जब दोनो बडे हो गये
तब इक दिन नारद जी
उससे मिलने आये हैं
और उसे उसके जीवन का
सब हाल बतलाये हैं
इतना सुन कंस क्रोधित हो उठा
और बदला लेने को
आतुर हो गया
उसने जा घोर तपस्या कर
ब्रह्मदेव को प्रसन्न कर
दस हजार हाथियो का बल पाया
और राजधानी मे आ उत्पात मचाया
अपने पिता को बंदी बनाया 
जैसा भूदेवों ने बतलाया था
वैसा ही उसने आचरण पाया था
कंस के अत्याचारों से
पृथ्वी का ह्रदय डोलने लगा
दस हजार हाथियों का बल
तपस्या में पाया था
उसके अत्याचार से
सबका मन थर्राया था
पूजा पाठ यज्ञ हवन
बंद करवा दिए

इक दिन जरासंध का 
एक हाथी पगला गया था
रास्ते से जाते कंस ने
उसे वश किया था
जरासंध ने उसके पौरुष
पर खुश हो
अपनी दो बेटियों
अस्ति और प्राप्ति
का उससे ब्याह किया
अस्ति और प्राप्ति
जैसे नाम थे वैसे ही
कंस के आचरण बनने लगे
अस्ति का मतलब" है "
और प्राप्ति कर अर्थ " इतना और पाना है "
बस इसी उहापोह में लग गया
घमंड से फूला ना समाता था
प्रजा पर मनमाने अत्याचार किया करता



क्रमश:

Thursday, July 14, 2011

कृष्ण लीला ………भाग 1

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
श्री गणेशाय नमः
श्री सरस्वत्यै नमः
श्री सदगुरुभ्यो नमः

दोस्तों
आज से श्रीमद भागवत के दशम स्कंध में जो भगवान कृष्ण की लीलाएं हैं उनको काव्य के रूप में लिखने की कोशिश की है ............अब ये हमारे कान्हा की मर्ज़ी है कब तक और क्या क्या लिखवाते हैं और आप सबको पढवाते हैं. ये मेरा इस तरह का पहला प्रयास है कोई त्रुटि हो तो माफ़ी चाहती हूँ.

मेरे ख्याल से गुरुपूर्णिमा से उत्तम कोई दिन नहीं होगा ये श्रृंखला शुरू करने का .........सब प्रभु प्रेरणा से हो रहा है.

जब शुकदेव जी परीक्षित को भगवान के दिव्य चरित्र सुना रहे थे और नौ स्कंध तक भगवान के विभिन्न अवतारों की कथा सुना चुके और देख लिया कि अब प्याला भर गया है तब इतना कह शुकदेव जी चुप हो गए उस वक्त परीक्षित व्याकुल हो गए क्योंकि अब तो प्रभु के चरित्रों का समय आया था और इसी वक्त शुकदेव जी चुप हो गए तब परीक्षित उनसे प्रार्थना करने लगे .........शायद शुकदेव जी भी देखना चाहते थे कि प्यास कितना बढ़ी है .




चतुर्थ दिवस की कथा ने कराया
परीक्षित को ज्ञान बोध
कर जोड़ कहने लगे 

शुकदेव जी
सूर्य वंशी राजाओं का
उद्भव आपने सुनाया है
जो मेरे मन को भाया है
ज्ञानोदय अब हो गया
मुक्ति का मार्ग दिख गया
कर कृपा अब कुछ
यदुवंशियों का हाल सुनाइए
और मेरे जीवन को सफल बनाइये
जिसमे जन्मे चन्द्र किरण स्वरूपी
आनंदघन कन्हैया लाल हैं 

उनकी बाल लीलाओं का अब दिग्दर्शन कराइए
उनके दिव्य चरित्रों का अब पान कराइए
कैसे मारा कंस को वो सब बतलाइए
इस अमृत तत्व रुपी सुधा का पान कराइए
मेरे मन मंदिर में
कान्हा प्रेम का सागर बहाइये
मेरे ह्रदय कमल पर
ठाकुर जी को बिठाइए 


इतना सुन शुकदेव जी कहने लगे
राजन चार दिन से तुमने
कुछ ना खाया पीया है
कुछ खा पीकर चित्त ठिकाने कर लेना
उसके बाद कृपामृत का पान कर लेना
इतना सुन राजन यो कहने लगे
नौ स्कंधों में जो आपने
अमृत पान कराया है
कर्ण दोने से मैंने वो
अमृत पान किया है
अब ना क्षुधा तृषा कोई सताती है
अब तो सिर्फ मनमोहन की
कथा ही याद आती है
इतना सुन प्रफुल्लित शुकदेव जी
प्रभु के चरणों में ध्यान लगा यो कहने लगे
शूरसेन राजा की पञ्च कन्याएं
और दश पुत्र हुए
बड़े पुत्र वासुदेव का विवाह किया
सत्रह पटरानियों को उसने
अंगीकार किया
अठारहवीं शादी जब
देवकी से होने लगी
आकाशवाणी तब ये होने लगे
आठवां पुत्र देवकी का
कंस को मारेगा
इतना सुन कंस ने
वासुदेव देवकी को कैद किया
वहीँ कैद में परब्रह्म ने जन्म लिया
इतना सुन राजा यों कहने लगा
गुरुदेव कृपा कर बतलाइए
विस्तार से सारी कथा सुनाइए
मेरे प्रभु की यूँ ना पहेलियाँ बुझाइए
जिसे सुनने को मेरा मन मचलता है
उस आनंद के सागर में मेरी भी
डुबकी लगवाइए
वो अलौकिक दिव्य अमृतपान कराइए 





क्रमश:

कृष्ण लीला ………भाग 1

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
श्री गणेशाय नमः
श्री सरस्वत्यै नमः
श्री सदगुरुभ्यो नमः

दोस्तों
आज से श्रीमद भागवत के दशम स्कंध में जो भगवान कृष्ण की लीलाएं हैं उनको काव्य के रूप में लिखने की कोशिश की है ............अब ये हमारे कान्हा की मर्ज़ी है कब तक और क्या क्या लिखवाते हैं और आप सबको पढवाते हैं. ये मेरा इस तरह का पहला प्रयास है कोई त्रुटि हो तो माफ़ी चाहती हूँ.

मेरे ख्याल से गुरुपूर्णिमा से उत्तम कोई दिन नहीं होगा ये श्रृंखला शुरू करने का .........सब प्रभु प्रेरणा से हो रहा है.

जब शुकदेव जी परीक्षित को भगवान के दिव्य चरित्र सुना रहे थे और नौ स्कंध तक भगवान के विभिन्न अवतारों की कथा सुना चुके और देख लिया कि अब प्याला भर गया है तब इतना कह शुकदेव जी चुप हो गए उस वक्त परीक्षित व्याकुल हो गए क्योंकि अब तो प्रभु के चरित्रों का समय आया था और इसी वक्त शुकदेव जी चुप हो गए तब परीक्षित उनसे प्रार्थना करने लगे .........शायद शुकदेव जी भी देखना चाहते थे कि प्यास कितना बढ़ी है .




चतुर्थ दिवस की कथा ने कराया
परीक्षित को ज्ञान बोध
कर जोड़ कहने लगे 

शुकदेव जी
सूर्य वंशी राजाओं का
उद्भव आपने सुनाया है
जो मेरे मन को भाया है
ज्ञानोदय अब हो गया
मुक्ति का मार्ग दिख गया
कर कृपा अब कुछ
यदुवंशियों का हाल सुनाइए
और मेरे जीवन को सफल बनाइये
जिसमे जन्मे चन्द्र किरण स्वरूपी
आनंदघन कन्हैया लाल हैं 

उनकी बाल लीलाओं का अब दिग्दर्शन कराइए
उनके दिव्य चरित्रों का अब पान कराइए
कैसे मारा कंस को वो सब बतलाइए
इस अमृत तत्व रुपी सुधा का पान कराइए
मेरे मन मंदिर में
कान्हा प्रेम का सागर बहाइये
मेरे ह्रदय कमल पर
ठाकुर जी को बिठाइए 


इतना सुन शुकदेव जी कहने लगे
राजन चार दिन से तुमने
कुछ ना खाया पीया है
कुछ खा पीकर चित्त ठिकाने कर लेना
उसके बाद कृपामृत का पान कर लेना
इतना सुन राजन यो कहने लगे
नौ स्कंधों में जो आपने
अमृत पान कराया है
कर्ण दोने से मैंने वो
अमृत पान किया है
अब ना क्षुधा तृषा कोई सताती है
अब तो सिर्फ मनमोहन की
कथा ही याद आती है
इतना सुन प्रफुल्लित शुकदेव जी
प्रभु के चरणों में ध्यान लगा यो कहने लगे
शूरसेन राजा की पञ्च कन्याएं
और दश पुत्र हुए
बड़े पुत्र वासुदेव का विवाह किया
सत्रह पटरानियों को उसने
अंगीकार किया
अठारहवीं शादी जब
देवकी से होने लगी
आकाशवाणी तब ये होने लगे
आठवां पुत्र देवकी का
कंस को मारेगा
इतना सुन कंस ने
वासुदेव देवकी को कैद किया
वहीँ कैद में परब्रह्म ने जन्म लिया
इतना सुन राजा यों कहने लगा
गुरुदेव कृपा कर बतलाइए
विस्तार से सारी कथा सुनाइए
मेरे प्रभु की यूँ ना पहेलियाँ बुझाइए
जिसे सुनने को मेरा मन मचलता है
उस आनंद के सागर में मेरी भी
डुबकी लगवाइए
वो अलौकिक दिव्य अमृतपान कराइए 





क्रमश:

Saturday, July 9, 2011

तोसे नैना लड गये जो इक बार

तोसे नैना लड गये जो इक बार
अब खुद को ढूँढे इत उत बावरी बयार
श्याम प्रेम मे री्झ गये दो नैना मतवार
दरस प्यास बुझत नाही चाहे देखे आठों याम


श्याम प्रेम रस माधुरी भीजत है जो इक बार

श्याममय हो जाय है सुध बुध सारी बिसार

मेरी अज्ञान मटकी फ़ोड दयी जा दिन से श्याम
अब श्याम बिना ना दीखत है दिन रात

मन माखन चुराय लिया जा दिना सों श्याम
ह्रदय सिंघासन बैठ गये वा दिना सों श्याम

अपनी सुध बिसार के हो गयी श्याम की डोर
जित ले जायेंगे उडाय के संग चलेगी डोर



नैनन की धोवन मे जब बहते श्याम हो अधीर
अंजुलि भर पी जाऊँ मै वो नैनन को नीर





दोस्तों
इस रसमयी धारा के प्रवाह को आगे बढाने के लिये मै
एक श्रंखला शुरु करने वाली हूँ जिसमे आनन्द की बयार 
बह रही होगी और उम्मीद करती हूँ आप सब का प्यार उसे 
भी इसी तरह मिलता रहेगा………ये शुभ कार्य मै गुरु 
पूर्णिमा से शुरु करने वाली हूँ।