Thursday, August 4, 2011

कृष्ण लीला ………भाग 6



इधर यशोदा जी की जब आँख खुली
चंद्रमुखी बालक को देख प्रसन्न हुईं
आनंद मंगल मन में छा गया
नन्द बाबा को समाचार पहुंचवा दिया
घर घर मंगल गान होने लगे 
सब नन्द भवन की तरफ़ दौडने लगे
सबके ह्रदय प्रफुल्लित होने लगे
प्रेमानंद ब्रह्मानंद छा गया
गोप गोपियों में
हर्षोल्लास छा गया
गोपियाँ नृत्य करने लगीं
मंगल वाद्य बजने लगे
मंत्रोच्चार होने लगे
नन्द बाबा दान करने लगे
नौ लाख गाय दान कर दी हैं 
पर फिर भी ना कोई गिनती है
बाबा हीरे मोती लुटाने लगे
सर्वस्व अपना न्योछावर करने लगे
जिसने पाया उसने भी ना
अपने पास रखा
दान को आगे वितरित किया
आनन्द ऐसा छाया था
ज्यों नन्दलाला हर घर मे आया था
साँवली सुरतिया मोहिनी मूरतिया
हर मन को भाने लगी
हर सखी कहने लगी
लाला मेरे घर आये हैं
किसी को भी ना ऐसा भान हुआ
लाला का जन्म नन्द बाबा घर हुआ
हर किसी को अहसास हुआ
ये मेरा है मेरे घर जन्मा है
देवी देवता ब्राह्मण वेश धर आने लगे
प्रभु दर्शन पा आनंदमग्न होने लगे
बाल ब्रह्म के दर्शन कर 
जन्म सफ़ल करने लगे
रिद्धि सिद्धियाँ अठखेलियाँ करने लगीं
ब्रजक्षेत्र लक्ष्मी का क्रीड़ास्थल बन गया
रोज आनंदोत्सव होने लगा 
इधर कंस का उदघोष सुना है
नन्द बाबा का मुख सूख गया है
आपस मे विचार किया
कंस को मनाने और कर देने के लिए
नन्द बाबा ने मथुरा को प्रस्थान किया
ताकि उनके लाला पर ना
कंस की कुदृष्टि पड़े
जब से सुना था बालकों का
वध करने का आदेश पारित किया है
तब से नन्द बाबा ने विचार किया
और जाकर मथुरा
कंस का भुगतान किया
अब वासुदेव से मिलने का
फ़र्ज़ भी निभाया
मित्रों ने हाल आदान प्रदान किये
कंस से बच्चों को बचाने के
उपाय तय किये
अब नन्द बाबा को जाने को कहा
इधर कंस को चैन ना पड़ता था
रात दिन उसे अपने 
मारने वाला ही दिखता था
अपने मत्रिमंड्ल से मशवरा किया
और
पूतना को कान्हा को
मारने का काम दिया

कृष्ण लीला ………भाग 6



इधर यशोदा जी की जब आँख खुली
चंद्रमुखी बालक को देख प्रसन्न हुईं
आनंद मंगल मन में छा गया
नन्द बाबा को समाचार पहुंचवा दिया
घर घर मंगल गान होने लगे 
सब नन्द भवन की तरफ़ दौडने लगे
सबके ह्रदय प्रफुल्लित होने लगे
प्रेमानंद ब्रह्मानंद छा गया
गोप गोपियों में
हर्षोल्लास छा गया
गोपियाँ नृत्य करने लगीं
मंगल वाद्य बजने लगे
मंत्रोच्चार होने लगे
नन्द बाबा दान करने लगे
नौ लाख गाय दान कर दी हैं 
पर फिर भी ना कोई गिनती है
बाबा हीरे मोती लुटाने लगे
सर्वस्व अपना न्योछावर करने लगे
जिसने पाया उसने भी ना
अपने पास रखा
दान को आगे वितरित किया
आनन्द ऐसा छाया था
ज्यों नन्दलाला हर घर मे आया था
साँवली सुरतिया मोहिनी मूरतिया
हर मन को भाने लगी
हर सखी कहने लगी
लाला मेरे घर आये हैं
किसी को भी ना ऐसा भान हुआ
लाला का जन्म नन्द बाबा घर हुआ
हर किसी को अहसास हुआ
ये मेरा है मेरे घर जन्मा है
देवी देवता ब्राह्मण वेश धर आने लगे
प्रभु दर्शन पा आनंदमग्न होने लगे
बाल ब्रह्म के दर्शन कर 
जन्म सफ़ल करने लगे
रिद्धि सिद्धियाँ अठखेलियाँ करने लगीं
ब्रजक्षेत्र लक्ष्मी का क्रीड़ास्थल बन गया
रोज आनंदोत्सव होने लगा 
इधर कंस का उदघोष सुना है
नन्द बाबा का मुख सूख गया है
आपस मे विचार किया
कंस को मनाने और कर देने के लिए
नन्द बाबा ने मथुरा को प्रस्थान किया
ताकि उनके लाला पर ना
कंस की कुदृष्टि पड़े
जब से सुना था बालकों का
वध करने का आदेश पारित किया है
तब से नन्द बाबा ने विचार किया
और जाकर मथुरा
कंस का भुगतान किया
अब वासुदेव से मिलने का
फ़र्ज़ भी निभाया
मित्रों ने हाल आदान प्रदान किये
कंस से बच्चों को बचाने के
उपाय तय किये
अब नन्द बाबा को जाने को कहा
इधर कंस को चैन ना पड़ता था
रात दिन उसे अपने 
मारने वाला ही दिखता था
अपने मत्रिमंड्ल से मशवरा किया
और
पूतना को कान्हा को
मारने का काम दिया

Monday, August 1, 2011

कृष्ण लीला ………भाग 5

इतना कह भगवान ने
बालक रूप धारण किया
और वसुदेव ने सूप में
भगवान को रख लिया
जैसे ही पहला कदम बढाया है
हथकड़ी बेड़ियाँ सारी खुल गयीं
ताले सारे टूट गए
दरवाज़े सारे खुल गए
बाहर बरखा रानी
अपना रूप दिखाने लगी

घटाटोप अंधियारा छाया है
घनघोर अँधेरे में
यमुना भी ऊपर चढ़कर
आने लगी
ठाकुर के चरण स्पर्श
करने को अकुलाने लगी
शेषनाग ने ऊपर भगवान के
छाँव करी
वसुदेव ठाकुर को बचाने को
हाथ ऊपर करने लगे
और यमुना भी रह रह
उफान पर आने लगी
चरण स्पर्श की लालसा में
हुलसाने लगी
अपने सभी प्रयत्न करने लगी
प्रभु ने सोचा
ये ऐसे नहीं मानेगी
कहीं बाबा ना डूब जायें
सोच प्रभु ने
अपने चरण बढ़ा
यमुना का मनोरथ पूर्ण किया
कल - कल करती
यमुना नीचे उतर गयी
हरि चरण के स्पर्श से
वो तो पावन हो गयी
गोकुल में नन्द द्वार खुला पाया
यशोदा के पास ठाकुर को लिटा
नव जन्मा कन्या को उठा लिया
इधर देवकी बेचैन हो रही थी
तभी वासुदेव जी पहुँच गए
कन्या को ला देवकी को दिया
देते ही किवाड़ और ताले बंद हो गए
हथकड़ी बेड़ियाँ वापस लग गयीं
तभी कन्या रोने लगी
रोना सुन पहरेदार जाग गए
दौड़े गए कंस के पास समाचार सुनाया
आपके शत्रु ने जन्म ले लिया
इतना सुन गिरता पड़ता
नंगी तलवार ले कंस
कैदखाने में पहुँच गया
देवकी के हाथ से
कन्या को छीन लिया
देवकी चिरौरी करने लगी
भैया तुम्हें डर तो आठवें पुत्र से था
मगर ये तो कन्या है
इसने क्या बिगाड़ा है
मगर कंस ने ना एक सुनी
उसे तो नारद जी की वाणी याद थी
जैसे ही कन्या को पटकने लगा
हाथ से वो छिटक गयी
और आसमाँ में पहुँच
दुर्गा का रूप लिया
जिसे देख कंस
थर थर कांप गया
सोचने लगा शायद
इसी के हाथों मेरी मृत्यु होगी
तभी देवी ये बोल पड़ी
हे कंस ! तुझे मारने वाला
और पृथ्वी का उद्धार करने वाला
तो बृज में जन्म ले चुका है
और तेरे पापों का अब घड़ा भर चुका है
इतना कह देवी अंतर्धान हुई
ये सुन कंस लज्जित और चिंतित हुआ
मन में विचार ये करने लगा
मैंने व्यर्थ की इन्हें इतना दुःख दिया
और देवताओं की बात का विश्वास किया
देवता तो शुरू से झूठे हैं
सारी बातें अपने
मंत्रिमंडल को बतला दीं
तब सब ये बोल उठे
राजन आप ना चिंतित हों
अगर उसने जन्म लिया है
तो अभी तो वो
मारने योग्य नहीं होगा
बालक रूप में इतनी शक्ति कहाँ
आज्ञा हो तो इन दिनों जन्मे
सभी बच्चों को मार डालें
उसके साथ वो भी ख़त्म हो जायेगा
आपका कांटा सदा के लिए मिट जायेगा
ये उपाय कंस के मन को भा गया
और उसका पाप का घड़ा
और भी भरने लगा

कृष्ण लीला ………भाग 5

इतना कह भगवान ने
बालक रूप धारण किया
और वसुदेव ने सूप में
भगवान को रख लिया
जैसे ही पहला कदम बढाया है
हथकड़ी बेड़ियाँ सारी खुल गयीं
ताले सारे टूट गए
दरवाज़े सारे खुल गए
बाहर बरखा रानी
अपना रूप दिखाने लगी

घटाटोप अंधियारा छाया है
घनघोर अँधेरे में
यमुना भी ऊपर चढ़कर
आने लगी
ठाकुर के चरण स्पर्श
करने को अकुलाने लगी
शेषनाग ने ऊपर भगवान के
छाँव करी
वसुदेव ठाकुर को बचाने को
हाथ ऊपर करने लगे
और यमुना भी रह रह
उफान पर आने लगी
चरण स्पर्श की लालसा में
हुलसाने लगी
अपने सभी प्रयत्न करने लगी
प्रभु ने सोचा
ये ऐसे नहीं मानेगी
कहीं बाबा ना डूब जायें
सोच प्रभु ने
अपने चरण बढ़ा
यमुना का मनोरथ पूर्ण किया
कल - कल करती
यमुना नीचे उतर गयी
हरि चरण के स्पर्श से
वो तो पावन हो गयी
गोकुल में नन्द द्वार खुला पाया
यशोदा के पास ठाकुर को लिटा
नव जन्मा कन्या को उठा लिया
इधर देवकी बेचैन हो रही थी
तभी वासुदेव जी पहुँच गए
कन्या को ला देवकी को दिया
देते ही किवाड़ और ताले बंद हो गए
हथकड़ी बेड़ियाँ वापस लग गयीं
तभी कन्या रोने लगी
रोना सुन पहरेदार जाग गए
दौड़े गए कंस के पास समाचार सुनाया
आपके शत्रु ने जन्म ले लिया
इतना सुन गिरता पड़ता
नंगी तलवार ले कंस
कैदखाने में पहुँच गया
देवकी के हाथ से
कन्या को छीन लिया
देवकी चिरौरी करने लगी
भैया तुम्हें डर तो आठवें पुत्र से था
मगर ये तो कन्या है
इसने क्या बिगाड़ा है
मगर कंस ने ना एक सुनी
उसे तो नारद जी की वाणी याद थी
जैसे ही कन्या को पटकने लगा
हाथ से वो छिटक गयी
और आसमाँ में पहुँच
दुर्गा का रूप लिया
जिसे देख कंस
थर थर कांप गया
सोचने लगा शायद
इसी के हाथों मेरी मृत्यु होगी
तभी देवी ये बोल पड़ी
हे कंस ! तुझे मारने वाला
और पृथ्वी का उद्धार करने वाला
तो बृज में जन्म ले चुका है
और तेरे पापों का अब घड़ा भर चुका है
इतना कह देवी अंतर्धान हुई
ये सुन कंस लज्जित और चिंतित हुआ
मन में विचार ये करने लगा
मैंने व्यर्थ की इन्हें इतना दुःख दिया
और देवताओं की बात का विश्वास किया
देवता तो शुरू से झूठे हैं
सारी बातें अपने
मंत्रिमंडल को बतला दीं
तब सब ये बोल उठे
राजन आप ना चिंतित हों
अगर उसने जन्म लिया है
तो अभी तो वो
मारने योग्य नहीं होगा
बालक रूप में इतनी शक्ति कहाँ
आज्ञा हो तो इन दिनों जन्मे
सभी बच्चों को मार डालें
उसके साथ वो भी ख़त्म हो जायेगा
आपका कांटा सदा के लिए मिट जायेगा
ये उपाय कंस के मन को भा गया
और उसका पाप का घड़ा
और भी भरने लगा

Tuesday, July 26, 2011

कृष्ण लीला ………भाग 4

जब प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ
वासुदेव ने लाकर कंस को दिया
शिशु को देख कंस का दिल पसीज गया
ये बालक है मेरा क्या बिगाड़ेगा
मुझे डर तो आठवें से है
ये तो पहला है ,सोच छोड़ दिया
पर कान के कच्चे पर
कोई कैसे करे विश्वास
हरि इच्छा से नारद जी
पहुंचे कंस के पास
एक फूल के माध्यम से
सारा सच समझा दिया
और हर पंखुड़ी को फूल की
आठवां गिना दिया
इतना सुन कंस ने
बालक को बुलवा लिया
और पत्थर पर पटक
बालक का प्राणांत किया
वासुदेव देवकी को
कारागार में डाल दिया

उनके छहों पुत्रों को
इसी तरह मार दिया 
सातवें पुत्र के रूप में
शेषनाग का अवतार थे
जो भगवान के प्रिय भक्त थे
भक्त का अहित भगवान
होने देते नहीं
उसके लिए सृष्टि के
नियम ताक पर रख देते हैं
 सातवाँ गर्भ वासुदेव की
दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में
स्थानांतरित किया
और सारे में ये फ़ैल गया
देवकी के गर्भपात हुआ
इतना सुन कंस खुश हुआ
सोचा मेरे डर से बालक
ने ना जन्म लिया
अब वैकुंठनाथ
जगत मंगल के लिए
गर्भ में आ गए
सब मंगल जग में छा गए
मुख कान्ति देवकी की
चमकने लगी
जिसे देख कंस की नींद
उड़ने लगी
मन ही मन कंस
डरने लगा
हर ओर सोते जागते
कृष्ण का चिंतन करने लगा
हर तरफ उसे 

बाल गोपाल दिखने लगा
वैर से ही सही वो
भगवान का स्मरण करने लगा
कंस ने पहरे कठिन बैठा दिए
सात ताले कोठरियों में लगवा दिए
भगवद जन्म  के समय
देवता सारे आ गए
अदृश्य रूप से स्तुति
प्रभु की करने लगे
प्रभु को पृथ्वी का
भार हरण करने के लिए
जल्द जन्म लेने को कहने लगे
जब से वैकुंठनाथ गर्भ में आये
परमानन्द छाने लगा था
बिन ऋतुओं के भी 

वृक्षों पर फल फूल आने लगे
ग्रह , नक्षत्र , तारे
सौम्य शांत होने लगे
दिशायें स्वच्छ प्रसन्न होने लगीं
तारे आकाश में जगमगाने लगे
घर घर मंत्राचार होने लगे
हवानाग्नी स्वयं प्रज्ज्वलित
 होने लगी
मुनियों के चित्त प्रसन्न होने लगे
रात्रि में सरोवरों में
कमल खिलने लगे
शीतल मंद सुगंध वायु बहने लगी
देवता दुन्दुभी बजाने लगे
गन्धर्व ,किन्नर मधुर स्वर से गाने लगे
अप्सराएं नृत्य करने लगीं
जल भरे मेघ वृष्टि करने लगे
चारों तरफ प्रकृति में
हर्षोल्लास मनने लगे
भाद्रपद का महीना
अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र
अर्ध रात्रि में जग नियंता
जगदीश्वर प्रभु ने
स्वयं को प्रगट किया
अंधियारी कुटिया में
उजियारा हो गया
वासुदेव देवकी कर जोड़
प्रभु की स्तुति करने लगे
स्तुति में अपनी व्यथा कहने लगे
तब प्रभु ने समझाया
जैसा मैं कहूँ
अब तुम वैसा ही करना
मुझे तुम नंदगाँव में
नंदबाबा के घर छोड़ आना
वहाँ मेरी माया ने जन्म लिया होगा
उसे यहाँ उठा लाना
मेरे भक्तों ने बहुत दुःख पाया है
अब कंस का अंत निकट आया है
ताले सारे खुल जायेंगे
रास्ते सारे तुम्हें मिल जायेंगे
जैसे पहला कदम उठाओगे
सब पहरेदार सो जायेंगे
किसी को कुछ भी
पता ना चलेगा
और अपना स्वरुप
पूर्ववत तुम  पा जाओगे

कृष्ण लीला ………भाग 4

जब प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ
वासुदेव ने लाकर कंस को दिया
शिशु को देख कंस का दिल पसीज गया
ये बालक है मेरा क्या बिगाड़ेगा
मुझे डर तो आठवें से है
ये तो पहला है ,सोच छोड़ दिया
पर कान के कच्चे पर
कोई कैसे करे विश्वास
हरि इच्छा से नारद जी
पहुंचे कंस के पास
एक फूल के माध्यम से
सारा सच समझा दिया
और हर पंखुड़ी को फूल की
आठवां गिना दिया
इतना सुन कंस ने
बालक को बुलवा लिया
और पत्थर पर पटक
बालक का प्राणांत किया
वासुदेव देवकी को
कारागार में डाल दिया

उनके छहों पुत्रों को
इसी तरह मार दिया 
सातवें पुत्र के रूप में
शेषनाग का अवतार थे
जो भगवान के प्रिय भक्त थे
भक्त का अहित भगवान
होने देते नहीं
उसके लिए सृष्टि के
नियम ताक पर रख देते हैं
 सातवाँ गर्भ वासुदेव की
दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में
स्थानांतरित किया
और सारे में ये फ़ैल गया
देवकी के गर्भपात हुआ
इतना सुन कंस खुश हुआ
सोचा मेरे डर से बालक
ने ना जन्म लिया
अब वैकुंठनाथ
जगत मंगल के लिए
गर्भ में आ गए
सब मंगल जग में छा गए
मुख कान्ति देवकी की
चमकने लगी
जिसे देख कंस की नींद
उड़ने लगी
मन ही मन कंस
डरने लगा
हर ओर सोते जागते
कृष्ण का चिंतन करने लगा
हर तरफ उसे 

बाल गोपाल दिखने लगा
वैर से ही सही वो
भगवान का स्मरण करने लगा
कंस ने पहरे कठिन बैठा दिए
सात ताले कोठरियों में लगवा दिए
भगवद जन्म  के समय
देवता सारे आ गए
अदृश्य रूप से स्तुति
प्रभु की करने लगे
प्रभु को पृथ्वी का
भार हरण करने के लिए
जल्द जन्म लेने को कहने लगे
जब से वैकुंठनाथ गर्भ में आये
परमानन्द छाने लगा था
बिन ऋतुओं के भी 

वृक्षों पर फल फूल आने लगे
ग्रह , नक्षत्र , तारे
सौम्य शांत होने लगे
दिशायें स्वच्छ प्रसन्न होने लगीं
तारे आकाश में जगमगाने लगे
घर घर मंत्राचार होने लगे
हवानाग्नी स्वयं प्रज्ज्वलित
 होने लगी
मुनियों के चित्त प्रसन्न होने लगे
रात्रि में सरोवरों में
कमल खिलने लगे
शीतल मंद सुगंध वायु बहने लगी
देवता दुन्दुभी बजाने लगे
गन्धर्व ,किन्नर मधुर स्वर से गाने लगे
अप्सराएं नृत्य करने लगीं
जल भरे मेघ वृष्टि करने लगे
चारों तरफ प्रकृति में
हर्षोल्लास मनने लगे
भाद्रपद का महीना
अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र
अर्ध रात्रि में जग नियंता
जगदीश्वर प्रभु ने
स्वयं को प्रगट किया
अंधियारी कुटिया में
उजियारा हो गया
वासुदेव देवकी कर जोड़
प्रभु की स्तुति करने लगे
स्तुति में अपनी व्यथा कहने लगे
तब प्रभु ने समझाया
जैसा मैं कहूँ
अब तुम वैसा ही करना
मुझे तुम नंदगाँव में
नंदबाबा के घर छोड़ आना
वहाँ मेरी माया ने जन्म लिया होगा
उसे यहाँ उठा लाना
मेरे भक्तों ने बहुत दुःख पाया है
अब कंस का अंत निकट आया है
ताले सारे खुल जायेंगे
रास्ते सारे तुम्हें मिल जायेंगे
जैसे पहला कदम उठाओगे
सब पहरेदार सो जायेंगे
किसी को कुछ भी
पता ना चलेगा
और अपना स्वरुप
पूर्ववत तुम  पा जाओगे

Friday, July 22, 2011

कृष्ण लीला………भाग 3

अब पृथ्वी बहुत घबरायी थी
गौ का रूप रख ब्रह्मा के पास आई थी
ब्रह्मा जी कहने लगे
इसका उपाय तो
विष्णु जी ही बताएँगे
और गौ को ले सभी देवता
महादेव सहित क्षीरसागर किनारे
करबद्ध प्रार्थना करने लगे
प्रभु तारनहारे
हमारी नैया पार लगा देना
जैसे ग्राह से गज को छुड़ाया
परशुराम अवतार लिया
पृथ्वी को क्षत्रिय रहित किया
ब्राह्मणों का उद्धार किया
राम रूप में भी
पृथ्वी का भार हरण किया
हर बार पृथ्वी के भार
को आपने दूर किया
इस बार भी उसकी
नैया पार लगाइए
अब देर ना लगाओ प्रभु
पृथ्वी भयातुर हो गयी है
आपकी शरण में आ गयी है
अब इसकी रक्षा कीजिये
पृथ्वी भार हरण के लिए
अब प्रभु अवतार लीजिये
स्तुति सुन आकाशवाणी हुई
पृथ्वी तुम डरो नहीं
जल्द मैं अवतार लूँगा
देवकी के गर्भ से जन्म लूँगा
यशोदा को  पालन का सुख दूंगा
जो भी सेवा करना चाहे
बाल लीलाओं का आनंद लेना चाहे
जाकर गोकुल में जन्म ले ले
इतना सुन सब आनंदमग्न हो गए
प्रभु गुणों को गाते
निज स्थानों पर गए
अब प्रभु जन्म की आस में
ज़िन्दगी बिताने लगे
देवताओं , गन्धर्व , किन्नर
ऋषि मुनि आदि ने
ब्रजक्षेत्र  में जन्म लिया
वेदों की ऋचाओं  ने
गोपी रूप धारण किया


इसके आगे शुकदेव जी कहने लगे
जब कंस का अत्याचार बढ़ा
तब उसने विचार किया
कुछ अच्छा कार्य करना चाहिए
सबके दिलों में सम्मान भी पाना चाहिए
इतना सोच उसने अपने
चाचा की लाडली देवकी का ब्याह तय किया
 देवकी का ब्याह कंस
वासुदेव से करने लगा
और बहुत धूम धाम से ब्याह किया
दान दहेज़ बहुत मन से दिया
प्रेम के वशीभूत हो
विदाई रथ को कंस
जब स्वयं हांकने लगा
तभी आकाशवाणी ने उद्घोष किया
जिसे इतने हर्ष से ले जाता है
उसी देवकी का आठवां पुत्र
तुझे चिरनिद्रा में सुलाएगा
तू काल के फंदे से ना बच पायेगा
इतना सुन कंस क्रोध से भर गया
अंग प्रत्यंग क्रोध  से जलने लगा
देवकी के बाल खींच जब
तलवार से उसे मारने लगा
तब वासुदेव जी ने विचार किया
अब ये इसकी बहन नहीं
मेरी भार्या है
और इसकी रक्षा करना
मेरा धरम होगा
वासुदेव धर्मनिष्ठ और सत्यव्रती थे
ये कंस जानता था
जब वासुदेव ने वचन दिया
अपना हर पुत्र तुम्हें भेंट करूँगा
चाहे जो कर लेना
मगर देवकी से कोई खतरा नहीं तुम्हें
इसलिए उसे छोड़ देना
सूर्य चंद्रमा को साक्षी जान
तुम्हें वचन मैं देता हूँ
इतना सुन कंस ने उन्हें छोड़ दिया



क्रमश: