Thursday, October 4, 2012

अलौकिक प्रेम

क्या हुआ 
जो नहीं किया
कभी किसी से प्रेम
क्या हुआ जो 
नहीं किया
कभी किसी से इज़हार
क्या हुआ 
जो नहीं किया
मोहब्बत पर ऐतबार
मगर फिर भी
प्रेम को परिभाषित 
तो कर दिया
जरूरी तो नहीं
परिभाषित करने के लिए
प्रेम का होना जरूरी हो
बिना आकंठ डूबे भी
कभी कभी 
गहराइयों का पता चल जाता है
बस चाहिए ही क्या होता है
थोड़ी सी संवेदनशीलता
और भावनाओं की पराकाष्ठा 
बिना प्रेम किये भी 
प्रेम को परिभाषित करने का जोखिम 
यूँ ही नहीं उठाया जाता
भावनाओं के अथाह सागर में से 
प्रेम का मोती खोजना ही
वास्तविक प्रेम का दुर्लभ रूप होता है 
जहाँ ना कृष्ण होता है
ना राधा होती है
मगर सिर्फ और सिर्फ प्रेम होता है
उसके लिए वजूदों से परे 
अहसासों का स्तम्भ होता है 
जो प्रेम में सराबोर होता है
फिर क्या फर्क पड़ता है
प्रेम किया या नहीं
मगर प्रेम को जान तो लिया 
और जिसने प्रेम को जाना उसी ने पाया भी 
बिना प्रेम किये भी प्रेम पाया जा सकता है 
बस उसके लिए अदृश्य तरंगों पर झूलने की कूवत सबमे नहीं होती

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