Thursday, October 4, 2012

छहों ऋतुएं मोहे ना भायी सखी री


छहों ऋतुएं मोहे ना भायी सखी री 
जब तक ना हो पी से मिलन सखी री
विरही मौसम ने डाला है डेरा
कृष्ण बिना सब जग है सूना
जब हो प्रीतम का दर्शन
तब जानूं आया है सावन
ये कैसा छाया है अँधेरा
सजन बिना ना आये सवेरा
पी से मिलन को तरस रही हैं
अँखियाँ बिन सावन बरस रही हैं
किस विधि मिलना होए सांवरिया से
प्रीत की भाँवर डाली सांवरिया से
 अब ना भाये कोई और जिया को 
विरहाग्नि दग्ध ह्रदय में 
कैसे आये अब चैन सखी री
सांवरिया बिन मैं बनी अधूरी 
दरस लालसा में जी रही हूँ
श्याम दरस को तरस रही हूँ
मोहे ना भाये कोई मौसम सखी री
श्याम बिन जीवन पतझड़ सखी री
ढूँढ लाओ कहीं से सांवरिया को
हाल ज़रा बतला दो पिया को
विरह वेदना सही नहीं जाती
आस की माँग भी उजड़ गयी है
बस श्याम नाम की रटना लगी है 
मीरा  तो मैं बन नहीं पाती
राधा को अब कहाँ से लाऊं 
कौन सा अब मैं जोग धराऊँ
जो श्यामा के मन को भाऊँ
ए री सखी ..........उनसे कहना
उन बिन मुझे ना भाये कोई गहना
हर मौसम बना है फीका
श्याम रंग मुझ पर भी डारें
अपनी प्रीत से मुझे भी निखारें
मैं भी उनकी बन जाऊँ
श्याम रंग में मैं रंग जाऊँ
जो उनके मन को मैं भाऊँ
तब तक ना भाये कोई मौसम सखी री 
कोई तो दो उन्हें संदेस सखी री.............

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